शेर का मुकाबला करें या भाग जाएं ?

शेर का मुकाबला करें या भाग जाएं ?

समझदारी क्या है ? भागे या मुकाबला करें! 

एक बार की बात है, दो दोस्त एक जंगल से गुजर रहे थे ।दोनों आपस में बातें करते हुए निकल रहे थे ,कि अचानक एक दोस्त बोला,
“यार अभी शेर आ जाए तो !”
तो दूसरे ने कहा, “हां अगर शेर आ जाए हालत तो खराब हो जाए अपनी। ” पहला वापस बोला, “ऐसी स्थिति में तुम क्या करोगे ?”
दूसरे ने जवाब दिया क्या करेंगे ! बचने का कोई जुगाड़ देखेंगे। पहला बोला, “बचने के लिए क्या करोगे यह बताओ !”
दूसरे साथी ने कुछ सोचा और सोच कर कहा,
“पेड़ पर चढ़ जाएंगे या फिर बस…” सोचते हुए बोला “या फिर कोई दूसरा रास्ता तो दिखता नहीं है। ऐसा नहीं हो सकता है क्या ! कि हम शेर को समझा दे कि वह हम पर हमला नहीं करें। ”
दूसरे ने जवाब दिया, “शेर को समझाना जरा कठिन है । वो वापस बोला “शेर को समझाना कठिन है, इसका मतलब है कि हमें शेर का मुकाबला करना पड़ेगा। शेर से दूर भागना पड़ेगा। ऐसा ही होता है जब हम समझ नहीं पाते हैं कि क्या करना है, या फिर स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है। तब हमारे पास दो ही विकल्प रहते हैं । या तो हम उसका मुकाबला करें, या फिर वहां से पीछे हट जायें।


पहला दोस्त बोला, “यार यह तुमने ठीक कह दिया। आज ऐसा ही करना चाहिए। किसी परिस्थिति में मुकाबला भी संभव नहीं हो तो पीछे हटना भी एक अच्छा विकल्प है।
दूसरा बोला “बिल्कुल सही कह रहे हो परिस्थितियां हमें निर्णय करना सिखाती है ।और जो व्यक्ति परिस्थितियों के अंतर्गत ठीक से निर्णय नहीं कर पाता है, या फिर वह परिस्थितियों से पहले अपने निर्णय को बांध कर रखता है । वह व्यक्ति असल में परिस्थितियों का मुकाबला कर ही नहीं पाता है।”
इस बहाने दृष्टांत से हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें पीछे हटना भी सीखना चाहिए। जो व्यक्ति पीछे हटना सीख लेता है, व्यक्ति परिस्थितियों से ठीक प्रकार से तादात्म्य बना पाता है, यही जीवन है।
जिंदगी में बड़े-बड़े निर्णय करना, बड़े-बड़े रास्ते तय करना, बड़ी मंजिलों को सामने रखना, और बड़े उद्देश्य की प्राप्ति में अपने आप को लगाए रखना एक ठीक फैसला नहीं है।
असल में जिंदगी में छोटे-छोटे निर्णय हमें चलना सिखाते हैं। और छोटे छोटे निर्णय उसे हम जीवन का जो मूल है, जिसे आनंद कहते हैं। उस रस को प्राप्त किया जा सकता है उसकी मिठास को महसूस किया जा सकता है। यही जीवन है। यही जीवन के छोटे-छोटे और सरल तरल सत्य है।

यह भी पढिये अकेले पैदल चलने का क्या फायदा है ?

Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *