गेँहू और गुलाब की कहानी

गेँहू और गुलाब की कहानी

गेंहू और गुलाब की कहानी

आज शाम को मुझे लिखना था। लेकिन मैं तय नही कर पा रहा था कि क्या लिखना है। ऐसा अक्सर होता है।
मुझे लगता है कि ये स्तिथि मेरे अकेले की ही नही है। हम सब के साथ ऐसा अक्सर होता है।
जो गृहिणी है, उसे यह तय करने में समय लगता है कि सब्जी क्या बनाई जाए। जो विद्यार्थी है, वो ठीक ठीक तय नही कर पाता है कि कौनसी किताब उठाऊँ।
हम अक्सर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते है। खड़े होते है एक जगह। और सोचने लगे कि अब क्या ! या अब कैसे ?
खैर। ऐसे ही एक गाँव मे गुलाब नाम का लड़का था। दस साल की उम्र रही होगी उसकी। गुलाब की माँ नही थी। लेकिन उसके एक भाई था बड़ा। ज्यादा बड़ा नही थी। तीन साल बड़ा था।
छोटे बच्चों को देखकर उन दोनों भाइयों के पिता ने दूसरी शादी कर ली। दूसरी पत्नी के साथ दो बच्चे भी आये, और इस तरह घर मे गुलाब सहित चार बच्चे हो गए।
थोड़े दिन बाद कुछ यूं हुआ कि गुलाब के पिता भी जाते रहे। और इस घर में गुलाब की दूसरी मां ही मुखिया रह गयी।
ये औरत अचानक से ऐसा होने पर घबरा गई। घबराए इंसान की असुरक्षा बहुत गम्भीर होती है।
आवेश में और कुछ डर की वजह से इस स्त्री ने इस घर को छोड़ने का निर्णय कर लिया।
ये निर्णय उसका अकेली का ही नही रहा होगा। उस औरत के भाइयों ने भी उसे उकसाया ही था। कुछ उसके परिवार जन भी कह रहे थे, कि बदकिस्मत औरत ! अब यहाँ क्या करेगी तू। लौट आ।
कुछ दिन बाद इसके घर वाले गुलाब के घर आये। और काम की चीजें और धन इकट्ठा करने लगे। साथ ले जाने के लिए।
गुलाब और उसका भाई घर को लुटते देख रहे थे। गुलाब कहता था कि उसकी पहले वाली माँ के पास सोने के दो बिस्कुट थे। जो बाद में उसके पिता ने नई मां के हवाले कर दिए थे।
वो लोग उन्हें भी अपने साथ बांध चुके थे।
शीशे की एक खिड़की थी। बहुत सुंदर सी। जब वो लोग उसे उखाड़ने लगे। तो गुलाब के बड़े भाई ने कहा कि ये मेरी माँ की निशानी है। मत ले जाओ।
गुलाब बताता है कि उन लोगों ने उसके भाई के चेहरे पर वार किया। और भाई का दाँत टूट गया।
ले गए वो लोग इतना कुछ।
अब क्या हुआ कि गुलाब और उसके भाई की स्तिथि मुझ जैसी ही हो गयी। नई माँ और उसके घरवाले सब कुछ ले गए थे।
दोनो भाई किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़े रह गए।
क्या करे, क्या न करे !
कैसे करें कुछ।
बच्चे ही तो थे।
खेती करने लगे। बीस साल लगे जमने में। अपनी शादियाँ भी की खुद ही।
मगर बीस साल बाद के उनके हाल बताने को कोई था अब।
मेरी मां। मेरी माँ बताती है कि जब उसने होश सम्भाला तब उनके घर मे आठ हाळी काम करते थे। खूब अनाज पैदा होता था। पाँच कुँए और दो सौ बीघा जमीन थी।
माँ के पिताजी को आसपास के लोग गुलाब पटेल के नाम से इज्जत करते थे। छोटे बड़े झगड़ों में लोग उन्हें फैसले करने बुलाते थे।
जब हम ठीक ठीक तय नही कर पाते है। या जब कोई व्यक्ति ठीक ठीक तय नही कर पाता है। तब ये कत्तई जरूरी नही है कि उसका अंत हो गया है। या रास्ता खत्म हो गया है।
हाँ ! एक रास्ता जरूर खत्म हो जाता है। लेकिन पाँव जमीन खोज लेते है। लेकिन चलकर खोजते है।
गुलाब ने गेंहू उगा लिया।
गेहूँ और गुलाब की कहानी तब शुरू हुई, जब गुलाब कुछ तय नही कर पा रहा था।
शायद जिंदगी में ऐसा ही होता है।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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