मधुमक्खी का छाता, वो रहस्मयी औरत और विश्वास की कहानी

मधुमक्खी का छाता, वो रहस्मयी औरत और विश्वास की कहानी

मधुमक्खी का छाता, वो रहस्मयी औरत और विश्वास की कहानी

कहतें है दुखी इंसान को विश्वास का सहारा होता है. और उसके भीतर का ये विश्वास ही उसे दुखो से पार करवाता है. 

मेरी माँ अक्सर एक कहानी सुनाती है.

वो बताती है कि शादी के सात साल बाद भी कोई सन्तान नहीं होने की वजह से उसे बहुत प्रताड़ना मिलती थी. गाँव की औरतें उसे कहती थी कि अब सन्तान सुख तो मिलने से रहा. इसलिए पति को दूसरी शादी कर लेनी चाहिए.

मेरे पिता इस तरफ ध्यान नही देते कि उन्हें दूसरी शादी करनी है या नहीं. उनकी अपनी दुनिया थी.

माँ घर में भी तिरस्कृत रहती थी. बताती है कि उसका मुँह देखने से भी लोगों को संकोच होता था. क्यूंकि वो निःसन्तान थी.

फिर भी वो उस घर में रह रही थी, अपना वक्त काट रही थी. उसके विश्वास भी अलग तरह के थे.

वो बताती है, कि एक कच्चे घर में एक कमरा था. उसमे मधुमक्खी ने छाता लगा लिया था. किसी औरत ने माँ को कह दिया कि इस छत्ते को मत हटाना. ये बड़ा शुभ है. माँ के लिए तो सन्तान ही शुभता थी उस वक्त. तो उसने सोचा कि इस मधुमक्खी के छाते की वजह से शायद उसकी गोद भर जाएगी. पड़ोस की औरत ने माँ को यह भी कहा था कि मधुमक्खी को गाँव में भवानी कहते है. और भवानी माँ दुर्गा का ही नाम है.

खैर महीना गुजरा, दो महीने गुजर गए. कच्चे कमरे में लगा छत्ता बड़ा होने लगा. और उससे शहद टपक कर नीचे गिरने लगा. छत्ते के नीचे माँ के पुराने कपडे रखे थे. शहद उन कपड़ो पर गिर रहा था. उस शहद ने माँ के कपड़ों को गला दिया.

लेकिन फिर भी माँ को ऐसा महसूस नही हुआ कि घर में कोई शुभ समाचार वाली बात होने वाली है.

एक दिन की बात है,

गाँव में एक औरत घर पूछते पूछते माँ के पास आई. और बोली कि तुम्हारे पति ने मुझे भेजा है शहर से. तुम्हारे बच्चे नहीं होते है ! उसका इलाज करने आई हूँ.

माँ ने दुखी और संकोच मन से हामी भर दी. उस औरत ने एक कागज निकाला उस पर एक दवा का लेप किया. और उसे माँ के पेट पर चिपका दिया. और बोली कि सात दिन तक खटाई नहीं खानी है. गोद हरी हो जाएगी.

ये कह कर वो औरत फ़ौरन वहाँ से चली गयी.

ये दिक्कत गाँव में एक दो औरतों को और भी थी, जब उन्हें यह मालूम चला कि एसी कोई ‘औरत’ आई है. तो गाँव से शहर जाने वाले रास्तों पर उसे ढूंढा गया. लेकिन वो मिली नहीं.

खैर आठ दस दिन बाद पिता शहर से लौटें तो घरवालो ने उनसे उस औरत के बारे में पूछा. पिता जी ने तो मना कर दिया कि उन्होंने किसी ऐसी औरत को नहीं भेजा !

लेकिन माँ के मन में यह विश्वास बैठ गया कि हो न हो, वो औरत माँ दुर्गा का ही रूप थी. और वो सच में माँ का इलाज करने ही आई थी.

विश्वास का असर देखिये. कि एक साल बाद मेरा जन्म भी हो गया.

मै माँ से पूछता हूँ कि उस मधुमक्खी के छाते का क्या हुआ फिर ? वो कब तक लगा रहा ! माँ बताती है, कि पता नहीं मधुमक्खियों ने कब वो छाता छोड़ दिया. लेकिन जब तक वो उस कमरे में रही. तब तक दुनिया की प्रताड़नाओं के बीच उसे विश्वास मिलता रहा. उसे रोज महसूस होता रहा कि एक न एक दिन उसकी दुनिया बदलेगी जरुर.

विश्वास है तो चाँद मामा है, और धरती माँ। विश्वास है तो बेटी घर से बाहर पढ़ सकती है, समस्त प्रत्यंचाओं के बीच। विश्वास है तो सुकून की नींद सो लेता है मौसम की ठगी का शिकार किसान। विश्वास है तो दामन आग से निकल आता है बिना जले। विश्वास है तभी एक दाना गेहूँ और दो घूंट पानी रात काट देते है पेट की। विश्वास है तभी दो क्षण जीने का सपना पाल लेती है आधी दुनिया।
अविश्वासी को भी अपने होने पर कितना विश्वास है। ओ पिता! मैंने तुम्हे दिया कच्चा दीपक, तुमने विश्वास से भरा इसमें तेल और जला कर आधी बिलात दूरी में उजास भर दिया। ओ पिता ! मैं अधूरा इंसान, तुमने विश्वास पढ़ कर पूरा कर दिया अधूरेपन का मसला।
विश्वास हत्याएं प्रतिबन्ध करता है, आत्महत्याएं निलंबित करता है। जीवन सींचता है, बीज रोपकर।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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