ये मोबाइल की लत कैसे छूटे आखिर

ये मोबाइल की लत कैसे छूटे आखिर

ये मोबाइल की लत कैसे छूटे आखिर ?

एक दिन हम सभी साथी चर्चा कर रहे थे। बातों बातों में मोबाइल का जिक्र छिड़ गया। वैसे भी आजकल दो तीन लोग बैठते है तो बातों बातों में मोबाइल और इससे जुड़ी चीजो या लोगों का जिक्र आ ही जाता है। दस बातों में से तीन बातें या तो किसी के स्टेटस की आ जाती है, या किसी के सोशल मीडिया अकाउंट की बात निकल पड़ती है।
खैर, हमारे साथी मनीष ने कहा कि मोबाइल लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा होता है, लेकिन धीरे धीरे ये लोगों को जकड़ चुका है।


प्रियांश ने भी हामी भरते हुए इसी बात की तस्दीक की, कि हम लोग गुलाम बन रहे है मोबाइल के।
संयोग से एक दो रोज पहले मैंने एक नेटफ्लिक्स फ़िल्म देखी थी, ‘ The social dilemma’
तो मैं भी अपनी बात को इस फ़िल्म के अनुभव के आधार पर कहना चाह रहा था।
लेकिन ये अक्सर होता है, कि जब हम कोई चर्चा करते है। तब अक्सर ये होता है, कि हम किसी एक बात पर फोकस नही रहते। और चर्चा पगडंडियों से चलते हुए पता नही किस रास्ते निकल जाती है।
मैंने कहा, कि मोबाइल और सोशल मीडिया के प्रभावों पर हमें बात करनी चाहिए। और हमारा डिस्कशन इस मुद्दे की जांच पड़ताल पर टिका रहना चाहिए। ताकि हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकें।
मनीष ने कहा कि, छोटे बच्चे दिन भर मोबाइल की मांग करते है। गेम खेलने के लिए। और सोचिये ! उन बच्चों के लिए मोबाइल इतना आसान हो गया है कि क्या हम उन्हें मोबाइल देने के लिए मना कर सकेंगे, जब वो थोड़े बड़े हो जाएंगे ?
प्रियांश बोला कि उसका ग्यारह साल का बच्चा कहता है कि उसके दो दोस्तों के पास खुद के मोबाइल फोन है। ऐसे में बच्चो के बालिग होने से पहले ही ऐसा माहौल बन जायेगा। कि उनके सर्किल में सबके पास मोबाइल हो जाएंगे तो हमे उन्हें आठवी दसवी क्लास में ही उन्हें मोबाइल दिलवाना ही पड़ेगा !
बात तो सही थी उनकी। लेकिन क्या करना चाहिए ऐसे में हमे ?
मोबाइल तो जरूरी भी है ! और मोबाइल के नुकसान भी है !
मनीष ने बड़ी ईमानदारी के साथ यह स्वीकार किया, कि हमने अपने घरों में ही मोबाइल का वातावरण बनाया है। जब हम ही सारे समय मोबाइल लेकर उलझे पड़े रहते है, तो घर के बच्चों में तो असर आएगा ही आएगा !
मैंने कहा, कि यार देखो ये नेटफ्लिक्स की मूवी देखने के बाद मैं अपने सारे सोशल मीडिया अकाउन्ट छोड़ चुका हूँ।
मैंने अपनी फ्रेंड लिस्ट से सारे दोस्तो को हटाया। और एक दो न्यूज और कहानियों के पेज रख लिए। वहाँ दिन में दो चार बार जाता हूँ, पढ़कर लौट आता हूँ।
मनीष ने कहा कि ये तो अति हो गयी। सभी लोग ऐसा नही कर सकते है, कोई मध्यममार्गी उपाय भी सोचना चाहिए हमे।
मैंने कहा कि यार उपाय है।
दिक्कत हमे फेसबुक या व्हाट्सएप से ऐसे नही है। दिक्कत तब होती है, जब हम नोटिफिकेशन चेक करते है।
एक तो पॉपअप नोटिफिकेशन बन्द करने चाहिए हमें।
और दूसरी बात यह कि, फेसबुक आदि पर आने वाले नोटिफिकेशन पर कम से हम ध्यान देना चाहिए।
तभी हम इस जाल में उलझने से बच पाएंगे।
नोटिफिकेशन इस जाल में घुसने का दरवाजा है।
प्रियांश बोला कि, वो सब ठीक है। लेकिन ये स्टोरीज और स्टेटस में छोटे वीडियो वाला मसला बहुत गम्भीर है। लोग घण्टो तक इन्हें देखते है। और जब देखने लगते है, तो हमे मालूम ही नही पड़ता कि कितना वक्त निकल गया।
मनीष हँस कर बोला, ये तो ध्यान देना पड़ेगा। हमेशा ध्यान रखना पड़ेगा, इस बात का। कि वीडियो कम देखे।
बात चलती चलती आखिर खुद पर ही आ गयी। आखिर हमारी चर्चा और पंचायती में यही निष्कर्ष निकाला, कि हमने खुद अगर ध्यान रख लिया। अपना स्क्रीन टाइम मैनेज कर लिया तो फिर हमारे बच्चों को भी ज्यादा समझाने की जरूरत नही पड़ेगी।
बच्चे देख कर ही तो सीखते है।
और स्क्रीन टाइम कम हो गया, तो हम भी थोड़ी और अच्छी जीवन शैली को जी पाएंगे।
तो ये रही हमारी चर्चा। चर्चा का फल तो ठीक निकल गया। लेकिन इसे पालन करने में दोस्तो को कोशिश करनी पड़ेगी।
लेकिन हाँ, बढ़िया चर्चा थी। कुछ न कुछ तो समझ मे आयी हमे ये बाते।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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