विद्यार्थी के पाँच लक्षण कौन कौन से है ?

विद्यार्थी के पाँच लक्षण कौन कौन से है ?

सवाल – विद्यार्थी के पाँच लक्षण कौन कौन से है ?

जवाब –

काक चेष्टा, बको ध्यानं,
स्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी, गृहत्यागी,
विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥

इस श्लोक को सुनते सुनते हमारी पीढ़ी गुजर गयी. हमारे बाद आने वालों की भी पीढ़ी गुजर जाएगी. लेकिन ठीक ठीक से हम यह शायद ही जान पायें कि इस श्लोक का वास्तविक अर्थ क्या है ? ये श्लोक क्या कहना चाहता है ? इस श्लोक के अनुसार विद्यार्थी ऐसा क्यों करें, और क्या करें की वह आदर्श विद्यार्थी बन जाएँ !

पहली बात पर सबसे पहले बात कर लेते है.

इस श्लोक का वास्तव में वही अर्थ है, जो आप समझ रहे है. मतलब कि किसी ने बातों बातों में आपको यह राय दी है. कि विद्यार्थी के इन पांचो गुणों को अपनाओगे तो तुम्हारे पढ़ाई से सम्बन्धित काम सफल हो जायेंगे. इससे ज्यादा बात किसी ने शायद आपसे इस बारे में की भी नहीं होगी. क्यूंकि उनको भी यही तक ही बताया गया था. बताने वालें का क्या दोष है. जितना बताया गया है उतना ही तो बताएगा आपको !

दूसरी बात : यह श्लोक क्या कहना चाहता है ?

साधारण सी बात है. कि यह श्लोक सिर्फ यह बताता है कि किसी विद्यार्थी के पांच मुख्य लक्षण कौन कौन से होते है. श्लोक को बनाने वालें ने कई विद्यार्थियों पर शोध किया होगा किसी समय. और उसे ये पांच बातें उन सभी विद्यार्थियों में कोमन लगी होगी. अतः श्लोक निर्माता ने लिख दिया कि विद्यार्थियों में ये पांच लक्षण होते है. उदाहरण के लिए आप सड़कों को देखिये. और बहुत सारी सड़कों को देखने के बाद आप यह निष्कर्ष निकाल लेते है कि अच्छी सड़क में कौन कौन सी पांच मुख्य विशेषताएं होती है. मायने सिर्फ इतने से है कि ये एक निष्कर्ष है. और इस श्लोक की खूबसूरती यह है, कि इसमें कहीं यह नहीं कहा गया है कि विद्यार्थियों के ये ही पांच लक्षण होने चाहिए. न ये कहा गया है कि इन पांच लक्षणों या गुणों को हर विद्यार्थी को अपनाने ही चाहिए. लेखक ने अपनी राय बताई, उसको सामान्य जानवरों और चीजो से जोड़ा और लिख कर छोड़ दिया बस. अब पढने वाले अपने विवेक से निर्णय लें, कि उन्हें इन गुणों को अपनाना चाहिए या फिर दूसरों को समझाने के लिए इस श्लोक को काम में लेना चाहिये.

तीसरी बात : विधार्थी इस श्लोक को अपनाने के लिए क्या करें ? अपने आप में क्या बदलाव करें ? इन गुणों को कैसे अपनाएँ ?

आप यही चाहते है कि आप इस श्लोक के आधार पर ही अपने विद्यार्थी होने को सही साबित करना चाहते है. तो एक बात आपसे जरुर कहूँगा पहले. कि आप उस व्यक्ति का नाम याद कर सकते है क्या ! जिसने आपको यह बात पहले पहल कही और आपको प्रेरित किया ? आपके पिता. आपके मित्र. या आपके कोई पसंदीदा शिक्षक होंगे वो. हुआ यह है कि उनकी बात आपके मन में घर कर गयी. और आप अपने आप को उस स्केल से नापने लग गए.

विदेशों में जहाँ यह श्लोक नहीं पहुंचा है वहाँ भी विद्यार्थी हुए है. वहाँ भी सफल विद्यार्थी हुए है. उनका काम तो खैर इस श्लोक को फ़ॉलो किए बगैर भी चल गया था. और चल रहा है आज भी. कहने का अर्थ है कि श्लोक के दायरे में इतना मत बंधिये कि आप इससे बाहर कुछ रचनात्मक सोच ही नहीं पायें. हाँ एक दिशा निर्देश के तौर पर आपसे जितना बन पड़े उतना आप इस श्लोक को अपनी दिनचर्या में शामिल करने की कोशिश कर सकते है. उसमे कोई बुराई है भी नहीं. लेकिन अगर आप सोते हुए भी यही धारणा रखे कि थोड़ी सी भी आहट पर आप चमक कर उठ जाएँ कुत्ते की तरह, या अपना भोजन बिलकुल ही कम कर देवे. तो विद्यार्थी बने ना बने आप मरीज जरुर बन जायेंगे.

फिर सही रास्ता क्या है ?

सही रास्ता हमेशा सरल होता है. दुर्गम हो तो भी आप सरलता से पूरा कर लेते है सही रास्ते को.

श्लोक को फिर से देखते है ;

काक चेष्टा, बको ध्यानं,
स्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पहारी, गृहत्यागी,
विद्यार्थी पंच लक्षणं ॥

 

काक चेष्टा ; अध्ययन करते समय आपको सतर्क और सजग रहना चाहिये. ठीक उसी तरह जैसे की कोई कव्वा अपना भोजन प्राप्त करते समय सजग रहता है. आप कोव्वे को रोटी का एक टुकड़ा फेंकिये और उसकी चपलता को देखिये. वो झट से टुकड़ा उठा लेगा. आपको भी उसी तरह सतर्क रहना चाहिए पढ़ते वक्त, या ज्ञान लेते वक्त. क्यूंकि कव्वे की तरह आपका इस समय भोजन पढ़ाई है. बाकी समय आप मस्त रहिये.

बको ध्यानम : बगुला देखा होगा आपने. एक टांग पर खड़ा रहता है. बिलकुल शांत चित्त. ऐसा लगता है जैसे मेडिटेशन कर रहा हो. किसी से कोई मतलब नहीं. बस अपने काम से काम. यहाँ समझाने का मतलब इतना ही है कि विधार्थी को भी बगुले जितना ही शांतचित्त होना चाहिए. शांत और स्थिर. विद्यार्थी कोई भी काम करें उसे अपने चित्त को बेहद तरल रखने की कोशिश करनी चाहिए. होता यह है कि विद्यार्थी अक्सर शिकायत करते है कि उन्हें याद कम होता है. या वे पढ़ी हुई बातों को जल्दी भूल जाते है. ये समस्या अधिकतर विद्यार्थियों के साथ होती है.

याद रखना और भूलना एक मनोवैज्ञानिक क्रिया है. और ये स्थापित तथ्य है, कि जो विद्यार्थी जितना शांत और स्थिर रहता है. पढ़े और सुने हुए को याद रखने की उसकी शक्ति उतनी ही मजबूत रहती है. आप कोलाहल में पढ़ नहीं पातें है ना. आप अशांत चित्त से कैसे चीजों को याद रख पाएंगे. इसलिए अध्ययन के दौरान चित्त शांत रहना चाहिए. दिनचर्या एसी रखिए की आप उद्द्वेलित नहीं हो. भावनाओ और आवेगों में बदलाव बहुत जल्दी जल्दी नहीं हो. आपका पूरा दिन एक दम शांत और स्थिर गुजरेगा तो जो पढेंगे वो आप सौ प्रतिशत याद रखेंगे अपने आप ही.

श्वान निंद्रा : कुत्ते की नींद को आपने ठीक ठीक नहीं समझा है. जब कुत्ता सो रहा होता है, तब आप उसे देखेंगे तो मालूम पड़ेगा की वह गहरी नींद में है. बहुत गहरी नींद में. लेकिन जब भी उसे उठना होता है उस समय वह बस उठ जाता है. अंगडाई नहीं लेता, पड़ा नहीं रहता आँखे खोलकर, न ही चाय मांगता है आपकी और मेरी तरह.

मतलब समझिये. जब भी नींद खुले और जागने का समय हो जाए तब बिस्तर छोड़ दीजिये. सुबह ही आपकी आलस से शुरू होगी तो आगे क्या ही होगा. इसका एक और प्रभाव है. जब आप नींद खुलते ही बिस्तर छोड़ देते है तो आपमें एक अलग तरह की उर्जा दौड़ती है. आप बहुत सक्रिय अवस्था में रहते है. सो , श्वान निंद्रा का अर्थ यही है की आप नींद से जागते ही खुद के रोम रोम को भी जगा लीजिये. उबासियाँ मत लेते रहिये.

अल्पहारी : खाने को लेकर एक बात समझ लीजिये. जितना भारी खाना आप खायेंगे, शरीर को उस खाने को पचाने में उतने ही ज्यादा खून की सप्लाई करनी पड़ेगी पाचनतंत्र में. अतिरिक्त खून मष्तिष्क से उतर कर पाचन क्रिया में शामिल होता है. और मष्तिष्क से खून का कुछ देर के लिए कम होना बेहोशी लाता है. और नींद भी एक तरह की बेहोशी ही है. इसी वजह से खाने के बाद नींद आती है. अब आप समझ गये होंगे कि विद्यार्थी को कम मात्रा में और हल्का खाना क्यों खाना चाहिए. आप चाहे तो दिन में पांच दफा थोडा थोडा खा लीजिये. लेकिन एक ही बार में ज्यादा खाना खायेंगे तो नींद और आलस आना बिलकुल नेचुरल है. फिर पढेंगे कैसे ? यही बात है यहाँ. 

गृहत्यागी : विद्यार्थी को गृहत्यागी होना चाहिए. इसका कत्तई मतलब यह नहीं है कि उसे किसी भी हालत में घर छोड़कर दूर रहना ही चाहिए. सीधी सी बात है कि बिना अपने एकांत के अध्ययन नहीं किया जा सकता है. अतः बहुत जरुरी है कि विद्यार्थी का अपना अलग कमरा हो, जहाँ वो अध्ययन कर सके. और जहाँ अलग कमरा नहीं हो सकें वहाँ विद्यार्थी रात में अपने लिए एक स्पेस का निर्माण कर लेवें. ताकि उसे डिस्टर्बेंस नहीं हो. गृहत्यागी होने का एक भावनात्मक कारण भी है. आप घर से दूर रहते है, लेकिन फिर भी घर की हर छोटी बड़ी बातों और घटनाओं में रूचि नहीं छुट रही है. तो अच्छा है कि आप घर ही चले जाएँ. क्यूंकि घर तो आपसे छूट ही नहीं रहा है. फिर आपका चित्त कैसे शांत रहेगा, आपका ध्यान और धारणा मजबूत कैसे होगी, आप कैसे अध्ययन के लिए मुफीद बनेंगे. 

कोशिश कीजिये की आप अपने आप को साध सके. थोड़े ही दिनों की बात होती है ये सब. अधिक से अधिक आठ महीने अपने आप पर , अपनी दिनचर्या पर, अपनी चित्त अवस्था पर ध्यान देंगे तो आप जो कुछ हांसिल करना चाहते है. वो हांसिल हो जाएगा. आप पर ही बहुत कुछ निर्भर होता है. 

शुक्रिया. सवाल हो कोई तो कमेन्ट बॉक्स में लिख दीजिये. 

 

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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