रोज छत पर टहलने वाली लड़की की कहानी

रोज छत पर टहलने वाली लड़की की कहानी

रोज छत पर टहलने वाली लड़की की कहानी

‘दुनिया भरोसे से चलती है’ ये बात सोचते हुए एक दिन मै छत पर टलह रहा था.

तभी रमेश का फोन आया, फोन उठा कर मैंने उसके हाल चाल पूछे. रमेश ने पूछा, “भैया क्या कर रहे हो ?” मैंने जवाब दिया कि यार बस छत पर घूम ही रहा हूँ.

रमेश बोला कि भैया छत पर घूमने की बात से एक कहानी याद आ गयी मुझे. छोटी सी कहानी है, सुनाओ क्या ! मैंने कहा कि यार सुनाओ ना.

उसने कहानी कुछ यूँ कही,

बोला,

“भैया तीन चार साल पहले की बात है. मै रोज शाम को अकेला छत पर टहलता था. उस वक्त आसपास दो मंजिला मकान नहीं थे. तो दो गली दूर के मकान भी आसानी से दिख जाते थे. सड़क के उस पार एक मकान था. जो अभी कुछ महीने पहले ही बना था. उस मकान में तीन भाइयों और एक बहन का परिवार रहता था. लड़के शायद कोई प्राइवेट काम ही करते थे. और लड़की पढ़ती होगी शायद.

ये लड़की भी सुबह शाम अपनी छत पर घुमने आती थी. शाम के वक्त लड़की और मेरा घुमने का एक ही वक्त रहता था. शुरू में तो हम दोनों का ध्यान एक दुसरे की तरफ नहीं गया. लेकिन एक दो दिन बाद मुझे महसूस हुआ कि मै बार बार उस लड़की की तरफ देखने लगा हूँ. हालाँकि लड़की मेरी तरफ नहीं देखा करती थी.

दो एक दिन और गुजरे और मै छत पर टहलते हुए छत के उस तरफ जा कर खड़ा हो जाता, जिस तरफ उस लड़की का घर था. असल में मै उस लड़की का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाह रहा था.

उस रोज शुरू में तो उस लड़की ने ध्यान नहीं दिया. लेकिन आप जानते हो लडकियों को आभास हो जाता है. खास कर जब कोई उन्हें इस तरह देखे तो वे ताड़ लेती है.

उसने भी मेरी तरफ दो एक बार देखा.

भैया, मुझे लगने लगा कि लड़की मुझमे रूचि दिखा सकती है. शाम को छत पर घुमने का एक कारण मिल गया हो जैसे मुझे भी.

अगले दिन से मै शाम को जल्दी घुमने आने लगा. और सुबह भी जब वो घुमती दिखाती देती तो मै भी अपनी छत पर घूमने लगा. अब ये बात स्थापित हो गयी कि उस लड़की को मालूम तो पड़ गया, कि मै उसके खातिर ही घूमता था छत पर.

बात एक दो दिन और चलती रही. मेरा ध्यान उसी पर रहता रोज. वो भी तिरछी नजरों से मुझे भांप लेती कि मै क्या कर रहा हूँ. मै कभी छत के इस कोने पर खड़ा हो जाता. कभी उस कोने पर खड़ा होकर उसे देखता. वो अपनी छत की दीवार पर बैठी होती तो कभी अपने भाई के छोटे बच्चे को लेकर घुमती रहती.”

मैंने पूछा, “यार रमेश आगे क्या हुआ यह तो बताओं.”

रमेश बोला, ” अरे यार भैया सुनो तो सही. तीन चार दिन बाद उस लड़की ने छत पर आना बंद कर दिया. मुझे लगा किसी काम में उलझी हुई होगी. तो नहीं आ पा रही.

लेकिन उसने तो बिलकुल ही आना बंद कर दिया.

मैंने सोचा कि ऐसा क्या हुआ होगा. कि उसने छत पर घुमना ही बंद कर दिया. दो चार दिन जब मैंने भी घूमना बंद कर दिया तो देखा कि वो अब कभी कभी वापस आने लगी है.

भैया ! पता है. उसने मेरी वजह से आना बंद किया था.

उस लड़की के लिए छत पर घूमना उसके अपने आसमान में टहलने जैसा था. जहाँ वो आजाद होकर अपने आप से बात करती होगी. सपने बुनती होगी. और शाम का आनंद लेती होगी.

उस वक्त वो नितांत अकेलेपन को महसूस करती थी. ये उसका निजी स्पेस था. छत उसकी अपनी जगह थी. लेकिन मैंने उसके निजत्व में खलल डाल दी. मेरी आँखों ने उसकी छत और उसकी जगह को उसकी नहीं नहीं रहने दिया.

गलती तो मैंने की थी भैया. गलती क्या थी, पाप था एक तरह से. मुझे आभास हुआ कि ये गलत हो गया मुझसे. मुझे उसकी तरफ ऐसे बार बार नहीं देखना चाहिए था.”

मैंने कहा, “ठीक है यार रमेश. लेकिन अब तुम्हे इस बात से निकलना पड़ेगा. तुम्हे अपने किये पर पछतावा हो रहा है. इस बात को मै शुभ कहूँगा. वरना बहुतेरे लड़के इस तरह लडकियों के निजी स्पेस में दखल को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है.”

रमेश ने जवाब दिया, “हांजी भैया. ठीक बात है आपकी. उस लड़की को भरोसा था कि वो शाम उसकी है. वो समय और वो छत का स्पेस उसका है. उसके इस भरोसे से ही उसकी जिन्दगी चल रही थी. हम जैसे लोग किसी की शाम, छत, और किसी के निजी स्पेस का भरोसा तोड़ देते है लेकिन. आखिर जिन्दगी तो भरोसे से ही चलती है भैया.”

मै आज भी सोचता हूँ. कि रमेश को जिंदगियो के प्रति कितना गहरा भरोसा रहा होगा आखिर ! कि उसने अपनी गलती को देख लिया. और किसी दुसरे शख्स के निजत्व का सम्मान करना उसे समझ में आ गया.

आखिर जिन्दगी भरोसे से ही चलती है. चाहे वो कोई और हो या हम खुद ही क्यों न हो.

लडकियों को भी तो अपने आप पर अपनी छत पर कितना भरोसा होता है न.

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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