रोड़वेज बस में अनजान हमसफर की बातें और उसकी सीखे : कहानी

रोड़वेज बस में अनजान हमसफर की बातें और उसकी सीखे : कहानी

रोड़वेज में अनजान हमसफर की बातें और उसकी सीखे : कहानी

रोड़वेज का सफ़र अच्छा लगता है. और तो कोई कारण नहीं है. बात इतनी सी है कि बाजू में बैठे अनजान आदमी से बात करने का मौका मिलता है. लोग अक्सर ये कहते है कि दुनिया बहुत बुरी है. लेकिन रोड़वेज बस में बहुत बार सफ़र में मिलें अनजान लोगों की कहानियाँ सुनकर मुझे ये लगता है कि लोग इतने भी खराब नहीं होते है, जितना उन्हें बिना जाने या बिना बात किये समझा जाता है. लोग बहुत अच्छे भी होते है. और बहुत अच्छा सा सिखा कर भी जाते है आपको थोड़े से घंटों की मुलाकात में.

सात आठ साल पहले की बात है. बस से जयपुर जा रहा था. बस अगले स्टेंड पर रुकी तो वहाँ से दो लड़के बस में चढ़े. और मेरी वाली सीट के आगे की सीट पर बैठ गए. दोनों हमउम्र ही थे. कोई तीस साल के करीब उम्र रही होगी उनकी. लड़के इस लिए बोल रहा हूँ, क्यूंकि मै अभी पैंतीस साल का हो चुका हूँ. और ये कहानी जब भी याद आती है, ऐसा लगता है जैसे की कल की ही बात है.

एक लड़का तो ईयर फोन लगा कर गाने सुनने में गुम हो गया. लेकिन दूसरा लड़का खिड़की वाली सीट पर बैठे बैठे गाना गुनगुनाने लगा. वो गाने को ऐसे गुनगुना रहा था, जैसे कि उसके आसपास कोई हो ही नहीं. एक दम मस्ती में, झूमता हुआ गुनगुना रहा था ; कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है. कुमार विश्वास की कविता को गीत बना कर गा रहा था.

मुझे लगा यार, बंदा बड़ा मस्त है. इससे बात करनी चाहिए. बहुत बार होता भी है कि मन की बाते सही हो जाती है. अगले स्टेशन पर कुछ ऐसी स्थिति बनी की उसके पास वाली सीट खाली हो गयी. और मै उसके पास जाकर बैठ गया.

हमारी बाते शुरू हुई. वो कथावाचक टोली के साथ काम करता था. ब्राह्मण लड़का था, और उसकी बातों में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास प्रकट हो रहा था. लेकिन कमाल की बात यह थी कि वो धार्मिक प्रवचन नहीं दे रहा था. ईश्वर से प्यार करने वाले प्रवचन नहीं देते है. उन्हें धर्म प्रचार से ज्यादा ईश्वर के प्रति प्रेम में ही ज्यादा रूचि होती है.

बात करते करते उसने पूछा कि तुम क्या करते हो ? मैंने कहा कि पढ़ाई करता हूँ. सरकारी नौकरियों की तैयारी करता हूँ. मुझे लगा उसे ज्यादा रूचि नहीं होगी इन बातों में तो मै इस सवाल के जवाब को टालना चाह रहा था.

लेकिन शायद जो लोग ईश्वर से प्रेम रखते है, वे मनुष्यों में भी रूचि रखते है.

वो एक दम से फोकस हो कर बोला, कि तैयारी किस नौकरी की करते हो यार , ये तो बताओ ?

मैंने संकोच करते हुए कहा कि सिविल सर्विस की तैयारी कर रहा हूँ.

लड़का थोडा रुका. उसने कुछ सोचा और फिर बोला कि, पढ़ाई बहुत करते होंगे न तुम. तो थक जाते होंगे यार !

मैंने कहा कि थकान तो होती ही है भाई साब.

उस लड़के ने दो सेकन्ड सोचा और कहा, “तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ यार. सुनो तुम.”

मैंने कहा कि ठीक है. सुनाओ.

वो बोला,

” हमारे गुरूजी थे. एक शाम को हम गुरूजी के सामने बैठे हुए थे. तब एक लड़की उनसे मिलने आई. गुरूजी को प्रणाम करके बोली, कि गुरूजी मेरी कोलेज की पढ़ाई अब पूरी हो गयी है. अब मै नौकरी के लिए फ़ार्म भरना चाहती हूँ. लेकिन ये समझ में नहीं आ रहा कि फ़ार्म कौनसा करना चाहिए.

गुरूजी ने कहा कि बेटा आईएएस का फ़ार्म भर दे. आईएएस बन तू. लड़की बोली कि गुरूजी मुझे तो यह भी मालूम नहीं है की आईएएस के लिए क्या करना पड़ता है ? कौन सी किताबे पढनी पढ़ती है ? कैसे परीक्षा होती है आईएएस की ? गुरूजी ने कहा कि बेटा वो फ़िक्र मत कर. तू फ़ार्म भर. और जब फ़ार्म भरे तब फ़ार्म यहाँ लेकर आना. उस वक्त ऑनलाइन फार्म नहीं भरते थे. ऑफ़लाइन ही भरने पड़ते थे फ़ार्म.

संयोग से एक दो महीने बाद लड़की जब फ़ार्म लेकर आई तब मै वही बैठा था. गुरु थे तो रोज आना जाना होता ही था. गुरूजी ने बोला की सारी डिटेल्स भर ले इसमें. लेकिन सिग्नेचर मत करना. सिग्नेचर का कालम आये तब मुझे बताना.

लड़की ने इत्मीनान से फ़ार्म भरा. और साइन करने का वक्त आया तो गुरूजी को कह दिया, कि अब बस साइन ही करने है. बाकी का फ़ार्म तो भर दिया है.

गुरूजी ने उससे कहा, देख साइन करने में जल्दबाजी नहीं करनी है. धीरे धीरे साइन करने है. और साइन करते वक्त यह सोच कर करने है कि एक आईएएस अधिकारी साइन कर रहा है. तू खुद को आईएएस अधिकारी समझ कर ही साइन कर. और पूरे मन से साइन कर इसमें.

लड़की ने ठीक वैसा ही किया भाई. जैसा गुरूजी ने कहा.

सवा एक साल बाद हमारे ही सामने वो लड़की मिठाई ले कर आई. और बोली की गुरूजी आईएएस परीक्षा में पास हो गयी हूँ. आईपीएस केडर मिला है. गुरूजी हँसते हुए बोले, पगली तू तो कह रही थी कि तुझे कुछ अतापता ही नहीं है आईएएस का. फिर कैसे पास हुई तू ये बता ? लड़की बोली कि गुरूजी जब आपने साइन करते वक्त धारणा मन में रखवा दी थी. उस धारणा ने ही संकल्प का रूप ले लिया. और जैसे जैसे आगे बढ़ी वैसे वैसे प्रीलिम्स, मैन्स और इंटरव्यू पास करती चली गयी. असली खेल तो धारणा का ही था. जब साइन करते वक्त ही मन में यह बात बैठ गयी कि मै एक आईएएस अधिकारी ही हूँ. तो फिर आईएएस में पास होना समय की बात रह गयी “

यह कहानी सुना कर उस लड़के ने मुझे एक बात बताई. कि भाई देखो ये तो हुई धारणा की बात. मन में धारणा होती है तो सब हो जाता है.

लेकिन तुम एक बात का ख्याल रखना,

जब भी पढ़ाई करों. और जब तक पढ़ाई करों. तब तक किसी इंसान या किसी परिस्तिथि की आलोचना मत करना. कोई बुराई मत करना किसी आदमी की या परिस्तिथि की.

तुम देखना, तुम न तो थकोगे. और न ही तुम निराश होंगे. तुम्हे याद भी अच्छा रहेगा. और तुम परेशान बिलकुल नहीं होंगे. तुम अपनी धुरी पर केन्द्रित होकर घूम जाओगे. और जब इंसान अपनी धुरी पर केन्द्रित होकर घूम जाता है. तो हर चीज हांसिल होने लगती है.

लड़का चला गया. लेकिन उसकी बात मन में बैठ गयी. उस साल इतनी किताबे पढ़ी. इतनी अच्छी तैयारी हुई कि क्या कहूँ. राजस्थान सिविल सेवा का प्रीलिम्स उसी साल पास हुआ. केन्द्रीय विद्यालय संगठन में आल इंडिया स्तर पर पीजीटी इतिहास की दो सीटें निकली थी. उस परीक्षा का प्रीलिम्स भी उसी साल पास किया.

और इतिहास से यूजीसी- नेट परीक्षा भी उसी साल पास हुई.

सच बात तो यह निकल कर समझ में आई, कि दुसरो की आलोचनाएँ हमे थका देती है. निराश कर देती है. आलोचनाओ से परे खुबसूरत संसार है.

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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