अक्टूबर की दोपहरी में

अक्टूबर की दोपहरी में

रात ढलती ढलती सर्द हो जाना चाहती है। सुबह बदन पर चांदनी के निशान मिलते है और कायनात से हटी सर्दी की झीनी चादर उघड़ी हुई मालूम होती है।

लेकिन दोपहरी ! अक्टूबर की दोपहरी चुपके से दखल देती है। घड़ी देखकर भी यकीन नही होता है कि 2 बज गए है दिन के। लगता है धूप ने बारिश के बाद से ही आराम करने का मन बना लिया था। या फिर धूप ने भी रात की सर्द हवाओं से दोस्ती कर ली है, बड़ी खामोशी से।

जो भी हो, इन दिनों हरसिंगार के फूल बंगलों की कतार के सामने बिछे हुए है। उनके बदन पर दिन की रोशनी और रात की बिछोह भरी सर्दी ने खुशबू जमा दी है। उस खुशबू को कोई महसूस करे न करे, शाम को लौटती लड़की जब गुजरेगी तब ये फूल करवट बदल कर उसे कह देंगे कि अक्टूबर का ये महीना खुशी, खुशबू और ख़ुश्क रातों का महीना है।

इस अक्टूबर में लोग बहुत बीमार है। लेकिन मृत्यु की खबरों में कमी आने का महीना भी तो यही है। इस तरह से ये महीना खूबसूरत दिलों के मरने का महीना तो कत्तई नही है। इस महीने में फूल जमीन कर गिरकर लोगों को मरने से जो बचा रहे है।

ईश्वर से प्रार्थना करते है; ये अक्टूबर बस चलता रहे। बहता रहे। और ये सभ्य सी, शालीन और संकोच करती हुई दोपहरियाँ ऐसे ही जिंदगी के झाग बनाती रहे। 

 

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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