नये ढाबे वाले भाई की कहानी

नये ढाबे वाले भाई की कहानी

नये ढाबे वाले भाई की कहानी

आज दोपहर में घर आते वक्त बीच में ढाबे पर रुक गया. भाई ने ढाबा शुरू किया है अभी दो महीने पहलें ही. शुरू में ये ढाबा पार्टनरशिप में था. लेकिन उन लोगों को जमा नहीं. और दुसरे साथी के अलग होने के बाद भाई ने अकेले ही इसे आगे चलाने का मन बना लिया. 

पिछली बार जब भाई से मिला था ढाबे पर ही. तब भाई थोडा संकोच में था, कि पता नहीं ये ढाबा चलेगा भी या नहीं. वो एक पैर से विकलांग है, लेकिन उसकी जीवटता गजब की है. हिम्मती लड़का है. उसका संकोच ठीक भी था. क्यूंकि ढाबा जहाँ शुरू किया था, ये जगह घर से तीस चालीस किलोमीटर की दूरी पर है. हाइवे है. लेकिन आसपास बड़ी बस्ती नहीं है. तो उसे लगता था कि बात जमेगी कैसे ? लेकिन फिर भी उसे अपने ड्राइवर दोस्तों पर यकीन था. उसे लगता था कि जैसे जैसे उसके दोस्तों और जानकारों को मालूम पड़ेगा. वैसे वैसे ढाबे पर रौनक बढ़ जाएगी.

आज ढाबे पर जाते ही उसने बढ़िया सी चाय पिलाई. और अपने काम में लगा रहा. सब्जी और मसालों का ऑर्डर दे रहा था वो उस वक्त.

काम से फारिग होकर हम बातों में लग गये. उसने बताया कि दीपावली के इन दिनों में ट्रको की रेलमपेल अच्छी है . सभी ड्राइवर लोग घर पहुँचने की जल्दी में है. इसलिए कम्पनियों और मंडियों से माल भर कर या खाली कर, सब घर लौट रहे है.

दीपावली पर ड्राइवर लोग अपनी गाडियों का पूजन भी करवाते है. तो गाड़ी को पूजन के लिए तैयार करने के लिए गाड़ी धुलवाते भी है. इसलिये भाई ने गाड़ी धोने की व्यवस्था भी करवा ली ढाबे पर ही. बाजू में एक मशीन लगवा ली. और एक लड़का रख लिया. एक गाड़ी की धुलाई के चार सौ रूपये मिलते है. तो इसने यूँ किया कि गाड़ी धोने वाले लड़के को दो सौ रूपये देता है. और बाकी के दौ सौ रूपये खुद बचा लेता है. आज बारह गाड़ियाँ धुल कर निकली है.

बता रहा था कि जब तक गाड़ी धुलती है, तब तक ड्राइवर लोग खुद भी नहा धो लेते है. और इस काम के लिए शेम्पू, साबुन, तेल आदि भी यही होटल से खरीद लेते है. फिर नहाने धोने के बाद भूख लगती ही है. तो ये लोग खाना खा कर यही पर घंटा दो घंटा आराम भी कर लेते है. फिर उठकर चाय पानी पीते है. और बीड़ी जर्दा लेकर घर के लिए निकल जाते है.

जब वो ये कहानी कह रहा था. तब मै उसके चेहरे की तरफ देख कर सोच रहा था. कि ये वही आदमी है जो पिछली बार संकोच और शंका से भरा हुआ था. लेकिन इस बार इसकी बातों में आत्मविश्वास है. ये सोच रहा है कि इसका काम चल पड़ेगा. और इन दिनों ये जो गाड़ी धोने से लेकर ड्राइवरों के बीड़ी- जर्दा लेकर जाने की जो कहानी है. इस कहानी में ये ड्राइवर को पूरा दीपावली पैकेज उपलब्ध करवा रहा है. ड्राइवर को गाड़ी धुलवाने से लेकर निकलते वक्त तक जिन जिन सामानों की जरुरत है. वो सारे सामान और सेवायें एक ही जगह मिल रही है.

व्यापार और व्यापार प्रबन्धन यही तो है. कि आप अपने ग्राहक को पूरा पैकेज दीजिये. आपकी सेवायें एक श्रंखला में मिलनी चाहिए. और वो श्रंखला इतनी सहज हो, इतनी सरल हो. कि ग्राहक बिना किसी परेशानी के ऑर्डर करता ही रहे. और उसका काम निर्बाध रूप से सम्पन्न हो जाए.

मुझे लग रहा है कि भाई इस काम को चला लेगा. उसके पास आज आज में पांच हजार रूपये आये है. और उसने हिसाब भी लगा लिया कि पांच हजार में से आधी रकम खर्चो में चली जाएगी. और बाकी के रूपये बच जायेंगे. ऐसे में महीने के बीस तीस हजार भी बचने लग जाएँ तो काम जम जाए.

ऐसे वक्त जब कोई उठ रहा होता है. तब मेरी कोशिश होती है कि उसकी बात को सुनता रहूँ. और बिना मांगे सलाह नहीं दूँ. क्यूंकि उसकी चेतना की लहर में अदृश्य सकारात्मक उर्जा महसूस होती है.

उस उर्जा का बहाव जरुरी है. उसके बीच में अपनी सलाहितों का अडंगा बेकार की बात है.

उम्मीद है. दीपावली के बाद जब वो घर से वापस ढाबे पर लौटेगा, तब उसकी उर्जा और भी बढ़ी हुई होगी. और वो नये किस्से और बिजनेस मेनेजमेंट की कहानी कहेगा.

( आपने पढ़ा. बहुत अच्छा लग रहा है आपको कहानी सुना कर. कहानी को आप व्हाट्स एप ,फेसबुक, किसी भी जगह शेयर कर सकते है. इजाजत की कोई जरुरत नहीं है.)

Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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