नरेंद्र मोदी, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस मुक्त भारत

नरेंद्र मोदी, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस मुक्त भारत

नरेंद्र मोदी , कांग्रेस और कांग्रेस मुक्त भारत 

कल 28 दिसंबर 2020 का दिन था।
इस तारीख से एक बहुत महत्वपूर्ण दिन जुड़ा हुआ है, और वह दिन है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर के ही दिन सन 1885 में हुई थी।
विद्वान लोग बताते हैं कि अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के बाद अंग्रेजो के खिलाफ भारतीय जनमानस में एक माहौल था। और भारतीय लोग अंग्रेजों को बहुत नापसंद कर रहे थे, ऐसे में अंग्रेजों को लगा की जनमानस में एक गहरा असंतोष है। और असंतोष को अगर जल्दी ही ठंडा नहीं किया जाए तो अट्ठारह सौ सत्तावन जैसे विप्लव की पुनरावृति हो सकती है।
विद्वान लोग बताते हैं कि लॉर्ड डफरिन ने ऐसी एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय जनमानस के असंतोष को चैनेलाइज करने की आवश्यकता है। और यह काम अगर जल्दी नहीं किया गया तो हो सकता है कि अट्ठारह सौ सत्तावन जैसा ही कोई विद्रोह भारतीय उपमहाद्वीप में घटित हो जाए। कांग्रेस के स्थापना की यह एक थ्योरी है जो बहुत प्रचलित है। अंततः वस्तुनिष्ठता यह घटी की डफरिन और एओ ह्यूम के सहयोग से 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हो गई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने शुरुआती दिनों में कहीं-कहीं अंग्रेजों के सहयोगी की तरह काम करती रही। लेकिन इस राजनीतिक पार्टी में लोगों को जागृत करना शुरू कर दिया। और भारतीय उपमहाद्वीप के लोग अपनी राजनीतिक चेतना के चलते कुछ और बेहतरीन काम करने लगे रहे।
1905 के बंगाल विभाजन के बाद कांग्रेस का चरित्र भारतीय जनमानस जनमानस के पक्ष में खड़ा होता चला गया। और 1915 के आते आते जब गांधी ने भारतीय राजनीति में पदार्पण किया, तो उनके पदार्पण के बाद कांग्रेस का पूरा चेहरा राष्ट्रवादी हो गया।
हालांकि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि गांधी का भारतीय राजनीति में पदार्पण भी अंग्रेजों की ही नीति थी, जिसके अंतर्गत भारतीय महाद्वीप के अपने राज्य को वे 50 साल और भोगना चाहते थे।
खैर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक लंबा संघर्ष किया, और संघर्ष के दौरान विभिन्न जातियों, क्षेत्रों और संस्कृतियों को एकजुट करने में सफल रही। कांग्रेस ने विभिन्न नेताओं के साथ मेलजोल किया। उन्हें एक एकजाया किया और अंततः 1947 में अंग्रेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
आजादी के बाद गांधी ने अपनी एक राय यह भी रखी, क्योंकि कांग्रेस एक आंदोलन के रूप में भारतीयों की इच्छा की अगुवाई करती रही है, अतः इसे समाप्त कर देना चाहिए। उनकी इस समझ के पीछे जो भी कारण रहे हो। चाहे वह कारण यह रहा हो कि गांधी संघर्ष के एक लंबे दौर के दौरान कांग्रेसियों की आपसी खींचातानी से परेशान हो चुके थे। और पार्टी के भीतर की राजनीति को लेकर उनके मन में कई तरह के संशय रहे होंगे, गांधी ने देखा कि संघर्ष के दौरान बहुत दफा केंद्रीय नेतृत्व और क्षेत्रीय स्तर के नेतृत्व में खींचतान होती रही थी। यह खींचतान विचार के स्तर पर भी थी और योजना के स्तर पर भी थी।
मसलन सुभाष चंद्र बोस का मसला हो, वल्लभ भाई पटेल का मसला हो, या फिर क्षेत्रीय नीतियों के आधार पर, योजनाओं के आधार, पर असंतोष नेताओं का मसला हो। देश आजाद हुआ और लगभग एकछत्र कांग्रेस ने भारतीय लोकतंत्र को नेतृत्व प्रदान किया।


आजादी से पहले भी कई नेताओं की चिंता थी, कि हमें आजादी के बाद एक अलग तरह की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। जिसके अंतर्गत अपने ही लोगों को राष्ट्र की भावना के प्रति एकजुट करने में बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी इस पूरी वंश परंपरा के अंतर्गत कांग्रेस में एक आंदोलन से एक पार्टी के रूप में मौजूद रहे। और किसी न किसी प्रकार कांग्रेस लोगों को यह विश्वास दिलाती रही कि कांग्रेस जन हितेषी है, कि कांग्रेस जन आधारित पार्टी है, और कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम भारतीय जनमानस की इच्छाओं से जुड़ते हैं। इस वंश परंपरा के अंतर्गत कांग्रेस की यात्रा लगभग 70 साल तक यूं ही आगे बढ़ती रही।
लेकिन सन 2014 के साल में भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना का उदय हुआ। वह घटना थी नरेंद्र मोदी का उदय। असल में यूपीए-2 के खिलाफ बहुत भारी असंतोष का माहौल था, और इस माहौल पर सवार होकर प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी प्रचार कर रहे थे। यहां तक तो ठीक था कि अगर किसी पार्टी के खिलाफ जनमानस में असंतोष है ,तो सीधे तौर पर इसका फायदा विपक्षी पार्टी को मिलता ही है। लेकिन अपने प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी यह बात जनमानस में स्थापित करने में सफल रहे कि भारत को भारतीय जनता पार्टी ही नहीं चाहिए ,बल्कि इसके साथ साथ कांग्रेस मुक्त भारत भी चाहिए। यह नई तरह की बात थी असल में।


ठीक है सत्तासीन पार्टी के पक्ष में माहौल है ,विपक्षी राजनीतिक पार्टी इसका लाभ भी लेगी। लेकिन मूल रूप से विपक्षी पार्टी की अर्थवेत्ता, उसका अस्तित्व और उसकी प्रासंगिकता ही नहीं रहे। या उसकी प्रासंगिकता को ही तिरस्कृत किया जाए, यह वास्तविक रूप से एक नई तरह की घटना थी।
खैर नरेंद्र मोदी चुनाव जीते। उनका पहला कार्यकाल जैसा भी रहा। वे दोबारा चुनाव लड़ने आए, और 2019 के चुनाव में उन्होंने पिछली बार से भी अधिक सीटें प्राप्त की। अब समझ में आ रहा था कि कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना वास्तविक रूप से क्या थी ?
प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का जुमला नहीं फेंका था। बल्कि उन्होंने अपने इस कार्यक्रम को लगभग सत्यापित भी कर दिया। कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई और लगातार छोटे मोटे छोटे बड़े चुनाव हारती चले गयी। मेरे ख्याल से अब हमें यह बात कर लेनी चाहिए कि कांग्रेस मुक्त भारत का कार्यक्रम भाजपा का कार्यक्रम था। जिसमें भाजपा सफल रही, या फिर कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना भारतीय जनता पार्टी की भविष्य दृष्टि भी थी कि काँग्रेस के मूल में जमी समस्याएं इसे कमजोर कर देंगी।
हमें दोनों ही पहलुओं पर ध्यान देना होगा । पहली बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी का उदय भारतीय राजनीति के आलोक में एक नई तरह की घटना है। जिसके अंतर्गत एक सामान्य से प्रचारक का राजनीति में दखल होता है। वह व्यक्ति एक राज्य का मुख्यमंत्री बनता है, और मुख्यमंत्री रहते हुए वह व्यक्ति जनता को इतना अपील करता है, कि खुद भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाना पड़ा। इसके पीछे बहुत सारी घटनाओं का सहयोग भी रहा है। लेकिन मोटे मोटे तौर पर हम यह मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी बेहद मुफीद व्यक्ति थे। उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था। वे बहुत ही परिश्रमी व्यक्ति के रूप में स्थापित हो चुके थे। कठोर निर्णय लेना, कठिन परिस्थितियों से नहीं घबराना आदि चीजों की ब्रांडिंग उनके साथ जुड़ी हुई थी। लेकिन यह बातें या ये मिथक कांग्रेस पार्टी के किसी भी नेता के साथ जुड़ी हुई नहीं थी। असल में हो तो यह रहा था कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पर जो परिवार काबिज था, उस गांधी परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों का इतिहास था। जमीनी परिश्रम से उनका कोई जुड़ाव नहीं था। और किचन केबिनेट जैसी चीजें उनकी राजनीति का प्रमुख अंग थी। हालांकि कांग्रेस पार्टी के साथ बहुत सारे विद्वान जनों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग था। लेकिन उसके बावजूद नरेंद्र मोदी जैसी लार्जर देन लाइफ व्यक्तित्व से लड़ने में असमर्थ है।
कांग्रेस पार्टी की निरंतर असफलता का प्रमुख कारण यह भी है कि उनके पास नरेंद्र मोदी की टक्कर का कोई नेता नहीं है। दूसरी बात पार्टी के स्ट्रक्चर और और उसकी ऑर्गेनाइजेशन को लेकर जो प्रबंधन नरेंद्र मोदी और उनकी टीम के पास है। उस तरह का प्रबंधन कांग्रेस में लगभग गायब है।
अभी भी स्थिति यह है कि कांग्रेस पार्टी के शीर्ष पर जो नेता बैठे हैं, उन्हें सीडब्ल्यूसी- कांग्रेस वर्किंग कमेटी निर्देश देती है। और कांग्रेस वर्किंग कमेटी में सम्मिलित जितने भी नेता हैं, वह उम्रदराज होकर लगभग निष्क्रिय हैं। हालत यह है की कांग्रेस के अध्यक्ष के लिए जो संघर्ष चल रहा है ,जो प्रतियोगिता चल रही है। उस प्रतियोगिता का आयोजन कांग्रेस वर्किंग कमेटी और कांग्रेस के बड़े नेता कर रहे हैं, और इस प्रतियोगिता के तीनों अभ्यर्थी गांधी परिवार से ही संबंधित है।


कुछ लोग चाहते हैं कि सोनिया गांधी नेतृत्व करती रहे। कुछ चाहते हैं कि बदलाव हो। और राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर काबिज हो। इसी तरह एक हिस्सा प्रियंका गांधी को भी अध्यक्ष बनवाना चाहता है , तो बताइए जब विकल्प एकमात्र गांधी परिवार ही है गांधी परिवार से बाहर विकल्पों की कोई तलाश नहीं है, और कांग्रेस के बड़े नेता अपने अपने हिसाब से समूह बनाकर गांधी परिवार के तीनों सदस्यों में से ही अध्यक्ष बनवाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ऑर्गेनाइजेशन का हाल क्या होगा ?
मुझे लगता है कि आने वाले फरवरी माह तक राहुल गांधी अध्यक्ष बन जाएंगे। और फिर शायद में अपनी नई टीम के साथ इस ऑर्गेनाइजेशन को वापस मजबूत करेंगे।

 

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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