क्या आप एक अच्छे कर्मचारी है ?

क्या आप एक अच्छे कर्मचारी है ?

क्या आप एक अच्छे कर्मचारी है ?

मै अक्सर बहुत सारे सरकारी और प्राइवेट जॉब कर रहे कर्मचारियों से मिलता हूँ. सभी तरह के पदों पर काम कर रहे लोग , जानकार और दोस्त मिलते रहते है. कोई कहीं ऑफिस डेस्क पर बैठ कर काम करता है, तो कोई उप जिला कलेक्टर के पद पर काम करता है. कोई किसी निजी संस्था में काम करता है तो कोई किसी मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करता है.

उन्हें देखकर मेरे मन में यह सवाल अक्सर आता है,

क्या यह व्यक्ति एक अच्छा कर्मचारी है , या नहीं !

उन्हें नाप तौल कर मै कुछ निष्कर्ष निकालता हूँ. और उन निष्कर्षों को लिखना चाहता हूँ.

  • कुछ लोग होते है जो अपना काम बहुत अच्छे से करते है. उन्हें जो भी काम दिया जाता है. उस काम को वे लोग बड़े मनोवेग से करते है. समय पर करते है. लेकिन वे अपने आसपास के वातावरण से, यानी अपने साथियों और वर्किंग कल्चर से अक्सर नाखुश दिखाई देते है. उन्हें लगता है, कि हर किसी को उन्ही के जैसे ही होना चाहिए. एक दम वाकत का पाबन्द और काम का पक्का. वे बहुत हद तक ठीक ही सोचते है. लेकिन मेरा ध्यान उनके व्यवहार पर जाता है. क्या जरुरी है, कि सभी लोग आप जितने ही पाबन्द और अनुशासन कुशल हो ! क्या यह जरुरी है कि आप अपने काम को लेकर जितने गम्भीर है, उतने ही गम्भीर दुसरे लोग भी रहे. और फिर आपकी कार्यकुशलता अगर आपको ही अस्थिर कर रही है तो फिर आपकी कुशलता का मतलब भी काया रह जाता है ! कितना अच्छा हो कि आप अपना काम करके ही संतुष्ट रहे. और दूसरों से ऎसी कुशलता की उम्मीद ही नहीं रखे. इससे कम से कम आप दुखी तो नहीं होंगे.
  • कुछ कार्मिक ऐसे भी होते है. जो बहुत अच्छा काम करते है. और उस काम में इतना डूब जाते है कि ऑफिस से जाने के बाद भी उसी का विचार करते रहते है. मेरा एक दोस्त जब अपनी कम्पनी की छुट्टी होने के बाद घर जाता, तो घर पर भी अपने साथियों के साथ ( वे साथ ही रहते थे) भी काम की ही चर्चा करता, लेपटोप खोल कर काम करता रहता. यह बात मुझे बहुत खटकती थी. मुझे लगता है आप जीवन को बेहतर करने के लिए कोई काम करते है, नौकरी करते है. ताकि आप आसानी से अपना गुजारा चला सकें. लेकिन आप नौकरी में बेहतर करने के लिए उसे जीवन में इस तरह तो शामिल नहीं कर सकते है, कि आपकों काम के अलावा कुछ दिखे ही नहीं. आप बंधुआ मजदूर नहीं है ! आप पढ़े लिखे और जहीन इंसान है. आप जीने के लिए काम करते है या काम के लिए ही जीते है. ये खराब प्रेक्टिस है. आपकी अपनी रचनात्मक वेल्यु है. आपके शौक है, आपका परिवार और साथी-संगी है. आप खुद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है. ऐसे करेंगे तो आप खुद को खो देंगे.
  • मेरा एक दोस्त है. बड़ा व्यवहार कुशल बन्दा है. पिछले दो साल से वो सरकारी नौकरी कर रहा है. लेकिन एक बड़ा परिवर्तन उसमे यह आ रहा है कि वो बहुत ज्यादा वक्त उन लोगों के साथ बिता रहा है जो असंगठित क्षेत्र में काम करते है. उन्ही के जैसे उठना बैठना , बात करना, खाना पीना करता है. परिणाम यह हुआ कि उसे अब अपनी नौकरी से उस तरह का लगाव नहीं रहा जो पहले था. वो काम पर कम ध्यान डेटा है. नियमित काम पर नहीं जाता है. उसने जैसे अपना ज़ोन ही बदल लिया है. मै उससे अक्सर कहना चाहता हूँ कि तुम अपने आप के साथ, अपने प्रोफेशन के साथ दगा कर रहे हो. यह कोई बहुत नैतिक बात नहीं है. कि तुम अपने काम के साथ संतुलन ही नहीं बैठा पाओं. सोचो तुम कितने भ्रमित हो कि तुम्हे अपने परिश्रम से अर्जित नौकरी की ही इज्जत करना नहीं आता है. मुझे नहीं लगता कि तुम जीवन में किसी और चीज की इज्जत कर भी पाओगे !
  • एक भैया है. बड़े मृदुभाषी है. जब उनकी नौकरी लगी तो वे नौकरी तो करते ही. साथ में उन्होंने एक आदत अपना ली. वे महात्मा गाँधी को नियमित तौर पर पढने लगे. उनके मन में यह विचार आया कि अपने गाँव में उन्हें गाँधी के विचारों को फैलाना चाहिए. लग गए काम में. और एक सप्ताह का आयोजन रखा, जिस दौरान उन्होंने डिशक्शन रखे, चित्रकला प्रतियोगिता रखी, और भी बहुत से आयोजन किये. बाद में उन्हें लगा कि कुछ पुख्ता करना चाहिए. तो उन्होंने पेड़ लगाने का काम किया और आजकल आसपास के इलाकों में बच्चों और यूथ के लिए लाइब्रेरीज शुरू करने का काम शुरू कर दिया. मुझे लगता है, ये आदमी अपने आप को समय देना सीख गया है. नौकरी के बाद कुछ रचनात्मक तो कर रहा है.
  • एक पुराने मित्र है. नौकरी करते है. शाम को अपने दोस्तों के साथ घूमते है. परिवार के साथ समय बिताते है. और कुछ न कुछ और अच्छा करने का विचार बनाते रहते है. यारबाजी और अड्डेबाजी उन्हें बहुत पसंद है. छोटा सा परिवार है. उसके साथ दुःख में दुखी और सुख में सुखी रहने का प्रयत्न करते है.

ये कुछ बेहतर और कमतर उदाहरण है. दुनिया में हर किस्म के लोग है. दुनिया का इन्द्रधनुष हर रंग के विचारों, अनुभवों और हर किस्म के लोगों से ही बना है. लेकिन इतना तो तय है कि सभी लोग बेहतर जीना चाहते है. बेहतर सुविधाओं के साथ जीना चाहते है. तो क्यों न आप संजीदगी से जीवन को जीने की कोशिश करें. क्यों न आप इस तरह संतुलन बैठाये कि आप बेहतर कर्मचारी बनने की जगह बेहतर और संतुलित व्यक्ति बनने की कोशिश करें.

आखिर एक अच्छा इंसान अच्छा कर्मचारी तो होता ही होता है. अच्छा कर्मचारी अच्छा इंसान हो, ये कत्तई जरुरी नहीं है.

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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