लड़का लड़की अच्छाई ढूंढ रहे थे, लेकिन सुन्दरता में : कहानी

लड़का लड़की अच्छाई ढूंढ रहे थे, लेकिन सुन्दरता में : कहानी

लड़का लड़की अच्छाई ढूंढ रहे थे, लेकिन सुन्दरता में : कहानी

लियो टोलस्तोय ने एक बार कहा था, कि‘कितना अजीब भ्रम है ये मानना की सुन्दरता अच्छाई है.”

सच बात कही है कि जो सुन्दर है वह जरुरी नहीं है कि अच्छा ही हो. सुन्दरता अलग चीज है. और अच्छाई अलग चीज है. लेकिन इंसान भ्रमित होता है ; ये सच्चाई है.

एक दोस्त था अपना. जितेन.

जितेन और मै कॉलेज में साथ साथ पढ़ते थे. हमारा नया नया एडमिशन हुआ ही था. और हम बड़े जोश से तैयार होकर कॉलेज जाते थे.

जितेन काफी अच्छा दिखता था. लम्बा था, बदन कसरती था. और बोलता कम था. कम बोलने वाले लोगों में अलग तरह का आकर्षण होता है.

एक रोज हम साइकिल स्टेंड पर अपनी साइकिल खड़ी करके क्लास की तरफ जा रहे थे. तो जितेन को एक लड़की ने रोक लिया. बोली आपसे बात करना चाहती हूँ. यह देख कर मै आगे निकल गया. और जितेन को वही छोड़ दिया.

घर आकर जितेन ने बताया कि लड़की उसे बहुत पसंद करती है. और दोस्ती का प्रस्ताव रखा है. मैंने कुछ नहीं कहा. बस उसकी बात सुन ली. और हम ऐसे ही नियमित तौर पर कॉलेज जाने लगे.

जितेन ने लड़की का प्रस्ताव क्या लिया, उसने जैसे मुसीबत मौल ले ली.

हर तीसरे दिन तो उस लड़की का कोई पुराना दोस्त उससे लड़ने आ रहा था. हर सप्ताह लड़की जितेन से नाराज हो रही थी. तो हर सातवें दिन ये महाशय उससे नाराज हो रहे थे. अच्छा खासा ड्रामा घटित हो रहा था.

हद तो यह हो गयी, कि एक रोज लड़की का कथित दोस्त जितेन को समझाने उससे घर आ पहुंचा ! जितेन को यह बात जब जमी नहीं तो उसने इस दोस्त को अपने दोस्त यानी मुझे हवाले कर दिया.

मै भी इसे सुना-अनसुना करके कॉलोनी के बाहर छोड़ कर आ गया. जंजाल काटा अपनी जान का.

मिडटर्म टेस्ट आ गये. और जितेन ने अब तक किताबे ही नहीं खरीदी थी. उसका आधा वक्त तो खुद को संवारने में गुजर रहा था. आधा वक्त वो बालिका के घर पर बिताता था.

दिन भर कभी शोपिंग करता, कभी जिम में पसीना बहाता तो कभी कुछ करता. लड़की के घर वाले जैसे ही काम पर जाते. अपने साहब लड़की के घर जाते, तो शाम को लौटते. जैसे कि नौकरी पर जा रहे है रोज.

एक दिन लड़की का फोन आया. मेरे पास. बहुत परेशान थी. बोली आप घर आइये. बात करनी है. मेरा उससे ठीक ठाक परिचय था ही. फिर भी जितेन की इजाजत लेकर उसके घर पहुँच गया.

लड़की बोली कि बहुत हो चुका. अब जितेन को समझाइये, कि इस रिश्ते का चरम गुजर गया है. वो अपने रास्ते निकले और मुझे अपने रास्ते जाने दे.

मैंने पूछा कि कोई दिक्कत हुई है क्या ?

वो बोली कि सीधी बात यह है, हम दोनों एक दुसरे की सुन्दरता से आकर्षित होकर एक दुसरे के साथ आ गये. लेकिन अब हमे लगने लगा है, कि हमारा परिवेश बिलकुल अलग है. हमारी समझ और उसका दायरा भी अलग है. इसलिए अब हम एक दुसरे के लिए ही समस्या बनने लगे है.

हमे लगा था कि सुन्दरता अच्छाई है. लेकिन हमारा सुन्दर होना अलग बात होती है. और हमारी अच्छाई बिलकुल अलग बात होती है.

खैर ! जैसा की हर मध्यस्थ के साथ होता है. मैंने उस लड़की को सुना. उसकी समझ की तारीफ की. और अपने दोस्त के पास पहुंचकर सारा हाल कह सुनाया. जहाँ जरुरत पड़ी, वहाँ कुछ बातों को छुपाया कुछ पर ज्यादा जोर दिया. मध्यस्थों की भी अपनी मजबूरियां होती है.

जितेन को दुःख हुआ. लड़का इस तरह से तैयार नहीं था. कुछ दिन उसने खाने पीने और घुमने में रूचि नहीं दिखाई. लेकिन एक रोज शाम को मेरे पास पहुंचा.

इधर उधर की बातें करने के बाद बोला, “यार एक लड़की को जानता है क्या तू ? रश्मि मिश्रा को !”

मै समझ गया. जतिन अपनी नयी अच्छाई को ढूंढ चुका है. ये लड़की भी दिखने में अच्छी थी. सुन्दरता ही उसके लिए अच्छापन है.

मुझे यह भी मालूम था, कि इस अच्छेपन का हश्र क्या होने वाला है. मैंने अपने मध्यस्थ होने की भूमिका से त्यागपत्र दे दिया था.

अब जतिन जाने और और उसके अच्छेपन की ये नयी यात्रा जाने.

एक और कहानी आपके लिए रोज छत पर टहलने वाली लड़की की कहानी

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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