जीवन विलक्षण और महान है

जीवन विलक्षण और महान है

जीवन विलक्षण और महान है

जीवन का नाम है ;विस्तार।जीवन का पूरा मतलब विस्तार है। जब हम पैदा हुए थे, तब हमने इस दुनिया में प्रवेश लिया था। उस प्रवेश के दौरान ही यह तय हो गया था कि, हमें जिंदगी को जीना है। लेकिन धीरे-धीरे जैसे जैसे हम बड़े हुए, वैसे वैसे बहुत सारे डर, बहुत सारी शंकाएं, बहुत सारी चिंताएं, ना चाहते हुए भी हमारे आसपास उगने लगी। हमारी पीठ पर चिपकने लगी। हमारी पीठ पर वे इस तरह चिपकी, कि न हम उसे देख सकते थे, ना हाथों से हटा सकते थे।
और जब बड़े हुए तो हमारा जीवन चिंताओं का सागर बन गया। परेशानियों का सबब बन गया। दुश्चिंतायें आज भी बेवजह, बेमतलब घेर लेती है। जबकि हम चिंताओं को लेकर पैदा नहीं हुए थे। जब हम पैदा हुए थे हमारे साथ हमारा शरीर था। हमारा एक ऐसा मन था, जिस पर चाहे जो लिखा जा सकता था। हमारे पास एक ऐसा मस्तिष्क था,जिस में बहुत सारा ज्ञान इकट्ठा करने की ताकत थी।
लेकिन जब हम बढ़े हुए तो ज्ञान की जगह इकट्ठा हो गया; डर। ताकत की जगह शंकाएँ जन्म लेने लगी।और आज !आज स्थिति यह है कि हम इधर उधर डोल रहे हैं कि कोई हमसे प्यार से बात कर ले, तो हम दिल खोल कर रो ले। हम अपनी पीड़ा ही कह देवे। हम अपनी समस्याओं को बता सकें।
लेकिन क्या पीड़ा को कहने से, समस्याओं को बताने से जन्म के समय हमारा जो चिरंजीवी स्वरूप था, जो उर्जा थी, वह वापस लौट सकती हैं !
हजार बार रो लीजिए उनके पहलू से लिपट कर,
मरहम तो फिर भी ना होगा।
लेकिन जब समझ में आया कि जीवन का मतलब है विस्तार, जीवन का मतलब है, ऊंचाइयां। जीवन का मतलब है, गहराई। तो यह समझ में भी आ गया, कि जीवन को बहुत ज्यादा समझने की कोशिश जीवन को नाकाम करने की कोशिश है।
जीवन के बारे में बहुत सारा उलझना ; मतलब बहुत सारा भटकाव पैदा होना है।
कितना अच्छा हो, कि ज्ञान की एक सीमा हो। कितना अच्छा हो, कि प्रार्थनाओं का कोई अंत न हो। कितना अच्छा हो कि हमारी महानता, हमारा विस्तार हर पल हमें याद रहे। और हम भूल जाए उन दुखों को, उन चिंताओं को, उन शंकाओं को जिन्हें लेकर रोज सुबह उठते हैं। जिन्हें छाती पर रखकर रोज सोते हैं।
मनुष्य होना परंपरा नहीं है। मनुष्य होना एक विलक्षणता है। और यह विलक्षण उसी समय से हमारे साथ है जिस समय हम पैदा हुए थे।
यही विलक्षणता हमें आनंद का अनुभव करवाती है। यही विलक्षणता हमें देर तक हंसाती है। यही विलक्षणता दुनिया को राख कहलवाती हैं। यही विलक्षणता धीमे धीमे जलते हुए दिए की लौ को देखकर जिंदगी का रास्ता बताती है।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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