जीवन का सर्वोच्च आदर्श क्या होना चाहिए ?

जीवन का सर्वोच्च आदर्श क्या होना चाहिए ?

स्वामी विवेकानंद से एक बार एक सवाल पूछा गया। पूछने वाले ने उनसे जानना चाहा , “स्वामी जी ! जीवन का सर्वोच्च आदर्श क्या होना चाहिए ? पूछने वाले का मन्तव्य यह था, कि जब हम जीवन को जीते हैं तब हमें कौन से रास्ते पर चलना चाहिए ? या फिर जिन आदर्शों की कल्पना करते हुए हम जीवन को जीते हैं, तब कौन सा ऐसा सिद्धांत है जिसे सभी आदर्शों के अंतर्गत सबसे ऊपर रखना चाहिए ?
स्वामी जी ने जवाब दिया कि किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन आदर्श बनाते हुए यह ध्यान में रखना चाहिए, कि अपना आदर्श कोई व्यक्ति नहीं हो
उनके कहने का मतलब यह जरूर रहा होगा कि वे आदर्श के रूप में व्यक्ति को सबसे निचले पायदान पर समझते हैं ।एक जगह विवेकानंद यह भी कहते हैं, कि विचार हमारा आदर्श होना चाहिए ना कि कोई व्यक्ति। सवाल का जवाब देते हुए विवेकानंद ने कहा कि त्याग का आदर्श सर्वोच्च है।
हालांकि त्याग का नाम सुनते ही हमें यह लगता है यह आदर्श सन्यासियों का आदर्श है। गृहस्थी और दुनियादारी का यह आदर्श नहीं हो सकता है। बुद्ध ने गृहस्थों को उपदेश देते हुए कहा था कि उन्हें चीजों को इकट्ठा करने की प्रवृत्ति को छोड़ना पड़ेगा। जितना अधिक चीजों को संग्रह करने की प्रवृत्ति बढ़ती है उतनी ही अधिक उन संग्रहित वस्तुओं के प्रति हमारी आसक्ति भी बढ़ती है। चीजों को इकट्ठा करते समय हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि उनसे बढ़ती हुई आसक्ति अंततः हमें परतंत्र कर देती है। हमारी स्वतंत्रता को बाधित कर देती है।
इसी बात को ओशो ने इस तरह कहा है कि व्यक्ति की मौलिकता, उसकी निजता,और उसकी स्वतंत्रता पहली चीज है। बाकी अन्य बातें द्वितीयक है। तो विवेकानंद जब यह कहते हैं कि त्याग ही सर्वोच्च आदर्श होना चाहिए। तब वे बताना चाहते हैं कि इस उच्चतम आदर्श को लेकर व्यक्ति एक स्वतंत्र जीवन जी सकता है।
हम देखते हैं की वस्तुओं को इकट्ठा करने की प्रवृत्ति और रिश्तो में नियंत्रण रखने की मानसिकता अंततः मनुष्य को परतंत्र बना देती है।


आज के समय में जब काउंसलरों का जमावड़ा है, जब रिश्तो को लेकर दैनिक दबाव है, और छोटे-मोटे डिप्रेशंस को लेकर अधिकतर लोग परेशान हैं। ऐसे में स्वामी विवेकानंद द्वारा सुझाव गई यह युक्ति प्रासंगिक लगती है, कि हमें चीजों को त्यागने की जागृति रखनी चाहिए। रिश्तो में एक दूसरे को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए। और जीवन को सरल और सहज और शांतिपूर्ण ढंग से जीने के लिए त्याग को प्राथमिकता देनी चाहिए।
बीसवीं सदी में औद्योगिकरण अपने चरम पर था। इस औद्योगिकरण ने मशीनों और संगठन की सहायता से भविष्य के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार कर दिया। उस समय तैयार किए गए उस ब्लूप्रिंट में बाजार नाम की एक व्यवस्था को जन्म दिया। बाजार में खरीदना और बेचना ही महत्वपूर्ण अवयव नहीं था, क्योंकि हम आज देखते हैं कि बाजार ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है ,और एक पॉपुलर कल्चर के तहत हमें इस बात के लिए लगभग मजबूर किया जा रहा है कि हम वस्तुओं को बड़े पैमाने पर संग्रहित करते चले जाएं। अपनी मौलिक और प्राकृतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त भी हमने 1000 प्रतिशत से ज्यादा बेवजह की चीजों को अपने पास इकट्ठा कर लिया है। चाहे वह कपड़े हो खाद्य सामग्री हो, प्रसाधन के सामान हो, या फिर अन्य भौतिक सुख सुविधाओं के नाम पर सामान हो इकट्ठा करने की इस प्रवृत्ति ने हमारे सामाजिक अंतर संबंधों को भी प्रभावित किया है। जिसके तहत अंतर-संबंधों में खरीदने की प्रतियोगिता ने जन्म लिया है। यानी संग्रहण की प्रतियोगिता ने रूप ले लिया है, और जब समाज में सामूहिक तौर पर इतने व्यापक तौर पर संग्रह करने की प्रवृत्ति आ गई हो, तब दबाव-विषाद और परतंत्रता प्राकृतिक रूप से सामान्य मनुष्य को घर ही लेंगे। यही वजह है कि आज मनुष्य का चरित्र लगातार अलगाव की स्थिति में रहता है ।बहुत सारी सुख सुविधाएं और संपन्नता इकट्ठा करने के बाद भी मानव का मन अपने आप को बेबस पाता है ।अकेलापन और अवसाद अनिवार्य तत्व हो चुके हैं, क्योंकि हमारा आदर्श संग्रह का है। हमारा आदर्श संग्रह से उपजी हुई आसक्ति का है।
ऐसे में वेदांत के हवाले से स्वामी विवेकानंद द्वारा सुझाए गई यह युक्ति महत्वपूर्ण है कि हमारा आदर्श हमारा सर्वोच्च आदर्श त्याग करने का होना चाहिए। जिससे कि माया की,अर्थात; दुनियादारी की परत आत्मा पर ;अर्थात रियलिटी पर जब नहीं पाए और हम सुकून से और शांतिपूर्ण तरीके से अपने जीवन के साथ जी सकें।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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