परेशान क्यों होते हो, जिंदगी के बहुत से रंग है।

परेशान क्यों होते हो, जिंदगी के बहुत से रंग है।

परेशान क्यों होते हो, जिंदगी के बहुत से रंग है। 

जिंदगी का कोई एक रंग नही है। ये बहुत सारे रंगों से मिलकर बनी हुई है। इंद्रधनुष होता है न, वैसी ही समझ लेते है इसे।

इंद्रधनुष के सभी रंग भी तो पसन्द नही आते है। किसी को गुलाबी पसन्द है, तो कोई नीले रंग पर जान छिड़कता है। जितने लोग, उतनी ही उनकी पसन्द।

यहाँ पर सब अपनी अपनी पसंद से जीते हुए चले जा रहे है। दो साथ रहने वाले लोग भी अलग अलग होते ही है। बस उनको एक दूसरे को पसन्द करना आता है, इसलिए वो साथ रहते है।

इतने रंगों को एक साथ देख लेना हर किसी के बस की बात नही है। मान लो सफेद रंग खुशी का रंग है, नीला समझदारी का, काला रंग दुख का, हरा रंग प्रसन्नता का, गुलाबी सुंदरता का। तो कोई एक साथ ही इन रंगों और भावों को देख सकता होगा क्या !

बस अलग अलग देख पाते है हम। इसी वजह से परेशान भी होते है। क्योंकि काला रंग पसन्द ही नही है, और हमेशा गुलाबी रंग ही देखना है।

लेकिन ये असम्भव है ना, कि हमेशा खुशी ही बनी रहे। या हमेशा समझदारी ही बनी रहे। तो हम पीछे दौड़ने लगते है अपनी अपनी पसंद के रंग और भावों के। कभी पकड़ लेते है, कभी रंग हाथों से फिसल जाता है।

पकड़ लेते है तो डर बना रहता है छूटने का। और रंग छूट जाता है तो दुख बना रहता है छूटने का। बड़ा ही झंझट वाला काम है ये सब।

क्या ऐसा नही कर सकते, कि जिंदगी के सभी रंगों को इज्जत से देखे। न किसी से गिला-शिकवा करें, न किसी को पसन्द बना कर टाँके। बस जो है, वो है। जो मिल रहा है वो मिल ही रहा है। जो नही मिल रहा है वो नही मिल रहा है।

पेड़ होते है न। बसन्त में भी खड़े रहते है, जेठ की दोपहरी में भी खड़े रहते है। दोनों ही जगहों में हरे रहते है। अब उनका सुख दुख तो वही जाने, लेकिन वो रहते बड़े व्यस्त है, अपने मे ही मस्त बस।

हम इंसानों को जितनी समझ मिली है। उतनी ही आशा भी मिली हुई है। लेकिन हमारी समझदारी रंगों को पकड़ने में ही जाया होती है ज्यादातर। आशा को भी हम हर जगह और हर इंसान पर चिपका देते है। जबकि आशा और समझदारी हमारे अपने आप के लिए होती है। खुद से आशा करे, खुद समझदारी बरते। और क्या ! अपनी चीजे अपने लिए ही है। अपने लिए काम लेने की चीजें है।

जिस रंग से हमें अपने लिए चित्र बनाने थे। उसे हम दूसरे के लिए काम मे लेंगे तो यही होगा न, कि उसका पसंदीदा रंग पता नही गुलाबी हो और हम उसे नीले से पोत दे तो !

सीधी ही बात है।

– जिंदगी के कई रंग है।

-सभी रंगों को हम एक साथ देख नही सकते तो पसंदीदा रंग कोई एक चुन लिया हर किसी ने।

-हम अपने रंग से दूसरे को पोतना चाहते है, जबकि हमे खुद के लिए वो रंग काम मे लेना है।

जिंदगी जैसी भी है, है। उसे गले लगा कर खुद को खुशी दी जा सकती है।

Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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