गांवो की एक काली हकीकत भी है

गांवो की एक काली हकीकत भी है

गांवो की एक काली हकीकत भी है

गाँव फिल्मों में और शहरों से देखने पर ही अच्छे लगते है। असल बात यह है कि भारतीय गाँव विपरीत मार्गी सामाजिक अड्डे है।
गाँवो के समाजशास्त्र में जितनी बुराइयाँ है, उतनी बुराइयाँ शायद ही कहीं किसी और समूह में मिलें। जरूरत है कि गांवों को ग्लैमराइज करने से बचते हुए कुछ रचनात्मक चुनौतियों को स्वीकारा जाएं।
गाँवो में दुश्मनी का अर्थ है, पीढ़ी और परम्परा तक घृणा और द्वेष का अंतरण। जवानियाँ लड़ते लड़ते बूढी हो जाती है, और लट्ठ अगली पीढ़ी को पकड़ा कर गंगाजी चली जाती है।
जो लोग मुस्लिम फतवों से इतना चिढ़ते है, उन्हें एक दफा गाँवो के अंदरूनी फतवों को देख लेना चाहिए एक बार। लड़कियों के कपड़ो, पढाई, विवाह से लेकर चुनावों में सामूहिक फतवों पर यहाँ बहुत ईमानदारी से काम होता है।
शहरों के शराबी नियत जगह बैठ कर शराब पी लेते है। गाँवो के शराबी समूह न वक्त देखते है, न जगह देखते है, न दस्तूर देखते है। शराबियों के ये समूह सिर्फ शराब देखते है, आगे पीछे इन्हें कुछ नही दिखाई देता।
गाँवो में गरीबी से भयंकर समस्या अकर्मण्यता की है। करमठोक लोग या तो उत्पादन व्यवस्था में अपनी भूमिका तय ही नही करेंगे, और भूमिका तय करेंगे तो नशे के रूप में अपने श्रम का दैनिक प्रतिदान पहले जरुरी हो जाता है।
सामाजिक ठेकेदार यहाँ इतनी बड़ी भूमिका में होते है कि वे दीखते प्रगतिशील है, लेकिन उनकी अधिकतम कोशिश गांव के अर्थतंत्र को कब्जाने की बनी रहती है। गांवभर में शादियों में दहेज, खर्च आदि को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से ये लोग ही निर्धारित करते है।
गाँवो का समाज असल में अर्ध-सामंती ढाँचा है। जो स्वतंत्र विचार, और निजता को दुत्कारता है। यहाँ अपना जीवन जीने वाले लोग सामाजिक रूप से हाशिये पर धकेल दिए जाने को अभिशप्त है, समाज में उनकी निर्णायक भूमिका लगभग नगण्य है।
गाँवो के अपने अवैज्ञानिक अन्धविश्वास है, अपनी वाहियात परम्पराये है।
जरुरी बात यह है कि ग्रामीण अपने समाज कि कमजोरियों को खुली आँखों से देखें और पूरे मन से स्वीकार करें।
मेरा गाँव तो मेरा गाँव है, कहने से काम थोड़ी चलता है.

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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