संवाद, स्त्री-पुरुष और प्रकृति से तालमेल

संवाद, स्त्री-पुरुष और प्रकृति से तालमेल

सम्वाद स्त्री-पुरूष और प्रकृति से तालमेल 

मैंने कई पुरुषों को देखा कि वह चलते हुए अपने आप से जोर-जोर से बात करते हैं। साइकिल चला रहे हैं और खुद से बात कर रहे हैं। रोड पर पैदल चल रहे हैं और पता नहीं क्या-क्या कह रहे हैं।
लेकिन कभी किसी स्त्री को ऐसे नहीं देखा है, कि वह चलते हुए खुद अपने आप से ही बोल कर बात कर रही हो। हो सकता है आपने देखा हो, लेकिन मेरे सामने एक भी ऐसा मसला अब तक नहीं आया है। गहरे से सोचता हूं तो कुछ छुटपुट से निष्कर्ष निकलकर सामने आते हैं। मसलन पुरुष अपनी अभिव्यक्ति को छुपा नहीं पाता है, अगर वह भीतर से बहुत परेशान हैं तो भी कहीं ना कहीं कैसे ना कैसे अपनी बात को बोलकर कहीं प्रकट देता है। उसका चिंतन उसका मनन भी छुप नहीं पाता है, प्रकट हो जाता है।
लेकिन स्त्री स्त्री अपने विचारों को, अपनी बातों को अपनी समस्याओं को, अक्सर हैं बोल नहीं पाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह अपनी बातों को घोलकर पी जाती है। ऐसा पता नहीं कैसे हो जाता है, कि स्त्री में बातों को घोटकर पीने का हुनर है। जबकि पुरुष अक्सर आपको सड़कों पर चलते हुए बोलते हुए पाए जाते हैं।


स्त्री और पुरुष को प्रकृति ने जैसा भी बनाया है लेकिन समान तरह से तो नहीं बनाया है। स्त्री के गुण अलग है, पुरुष के गुण स्त्री से अलग हैं। और यह भिन्नता समाज के स्तर पर उन दोनों को अलग-अलग तो करती ही है, यही भिन्नता उन दोनों को ऊपर-नीचे के स्तर पर भी बांट देती है। मसलन समाज अगर पुरुष प्रधान है, शक्ति प्रदान है, तो पुरुष की उच्चता गढ़ दी जाती है। और अगर समाज रचनात्मक प्रधान है, तो वहां स्त्री पुरुष से ऊंचे पायदान पर बैठा दी जाती है। इस दुनिया का यही दस्तूर है। यहां कोई बराबर नहीं है। यहां सममूल्य के पक्ष में कोई तर्क नहीं है। कोई प्रेक्टिस नहीं है। यहां कोई आगे है तो कोई पीछे है। यहां साथ-साथ कोई नहीं चल रहा है।
स्त्री जब अपनी बात को अभिव्यक्त नहीं कर पा रही है बोल कर। अपनी बात को कह नहीं पा रही है, तो ऐसे में हमें समझ जाना चाहिए कि उसकी अभिव्यक्ति पुरुष के मुकाबले अपूर्ण नहीं है, न हीं स्त्री की अभिव्यक्तियां पुरुष के बनिस्बत कहीं पीछे हैं, ना विलोम है।
असल में अभिव्यक्ति और संवाद एक पूर्ण प्रक्रिया है। जिसके अंतर्गत बोलना भी गिना जाता है। और नहीं बोलना भी उतना ही मायने रखता है। पुरुष जब अपनी सभी व्यक्तियों को बोल कर कह देता है, स्त्री उन्हीं अभी अभिव्यक्तियों को चुप रह कर पी जाती है। यहां किसी भी प्रकार का ऊपर नीचे का मसला नहीं है। आगे पीछे की बात नहीं है। यह दोनों बातें अभिव्यक्ति को उसकी संपूर्णता को समझने का विषय है।


अगर फिर भी, चलते हुए बात करने का, और चलते हुए मनन करने का अन्वेषण किया जा रहा है। तो कम से कम इस बात पर सहमत हुआ जा सकता है, कि पुरुष के पास संकोचों से मुक्ति है। पुरुष सहज रूप से अपनी बात कह सकने में समर्थ है। जबकि स्त्री के संकोच स्त्री की अभिव्यक्तियाँ, उसके संवाद गूढ़ है। संकोचों से भरे हुए हैं। समाज ने उसे शर्म और लाज के भीतर इतना कैद कर दिया है, इतनी सारी शर्तें लगा दी है, कि वह अनकांशस में भी बोलकर चलते हुए खुद से बात नहीं कर पाती है।
समाज ने उसके दायरे इतने सीमित कर दिए हैं, उसकी स्वतंत्रता को इतना बाधित कर दिया है, कि वह संकोचों के कारण, शर्म के कारण, लाज के कारण, अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट नहीं कर पा रही है। ख़िलदण्ड नहीं हो पाएगी, कभी वह अठ्ठाहस के साथ हँस नहीं पाएगी। कभी उसका चेहरा विद्रूप नहीं हो पाएगा। वह अपने लालच, अपनी कामनाएं छुपाकर चलेगी। वह आपको कभी प्रकट नहीं होगी।
जो समाज स्त्री के प्रति इतना निर्मम है उसने पुरुष को भी उतना ही निर्मम बना दिया है। क्योंकि समाज अपने आप में कोई व्यक्ति नहीं है। इसीलिए समाज ने पुरुष को स्त्री पर नियंत्रण करने का औजार बनाया है। यह समूह, यह संस्थाएं, यह समाज बराबरी पर आकर नहीं सोचते हैं। इनका अस्तित्व ही इसलिए है, क्योंकि यह सत्ता का एक पदानुक्रम तैयार करते हैं। जहां पदानुक्रम नहीं है जहां श्रेष्ठता और हीनता का बोध नहीं है, जहां ऊंचे और नीचे का भेद नहीं है, यकीनन वहां समाज भी नहीं होगा।
वह व्यवस्था एक प्राकृतिक व्यवस्था होगी जहां बंधनों से मुक्ति है। संवादों की अभिव्यक्ति है। जहां पुरुष अपने आप में पुरुष है, जहां स्त्री अपने आप में स्त्री है।


जहां पेड़ पौधे आगे बढ़कर स्त्री और पुरुष को गले से लगा सकेंगे। पेड़ पौधे समझ पाएंगे कि स्त्री और पुरुष अब गले लगाने लायक हैं। अब उनकी बिरादरी में शामिल होने के लायक हैं। पेड़ों को देखिए वहां किसी प्रकार का कोई पदानुक्रम नहीं है। वहां किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है। वहां किसी प्रकार की ईगो कॉन्फ्लिक्ट नहीं है।
पेड़ किसी दूसरे पेड़ से होड़ नहीं करते हैं, क्योंकि उनका अपने आप में कोई समाज नहीं है। कोई संस्था नहीं है। इसीलिए वे चुपचाप खड़े रहते हैं, प्रकृति की हर दुश्वारियों को झेल जाते हैं।
हवा चलती है तो लगता है पेड़ झूम रहे हैं। धूप पड़ती है तो लगता है झुलस रहे हैं। लेकिन उनका स्वास्थ्य और उनका यौवन फिर भी प्रभावित नही होता है।
जिस रोज समाज नहीं था उस रोज मनुष्यों के सगे संबंधियों, दोस्तों में वृक्षों का भी नाम आता होगा। उस रोज मनुष्य पेड़ों से बात कर पाते होंगे। उनके साथ तारतम्य से रह पाते होंगे। लेकिन आज जब समाज है, जब व्यवस्थाएं हैं, जब संस्थाएं हैं तो मनुष्य पेड़ों को सिर्फ अपने ढंग से काम लेना समझता है। प्रकृति उसके लिए उपयोग की वस्तु है। या भोग की वस्तु है। ऐसा नहीं है कि मैं किसी यूटोपिया की कल्पना कर रहा हूं। अतीत में ऐसा संभव हो चुका है, कि मनुष्य और पेड़ सामान्यतः पूर्ण ढंग से साथ साथ रहे हैं ।
यह संयोग नहीं है कि गांव में पेड़ पौधों का स्थान देव तुल्य है। कहीं ना कहीं ग्रामीण मनुष्य की स्मृतियों में अतीत अभी भी जीवित है। इतिहास, पुराने स्वप्न, पुरानी संभावनाएं उसे प्रकृति के नजदीक रहने को प्रेरित करते हैं। उसका संवाद प्रकृति के साथ तारतम्य में रहता है। हो सकता है ऐसा समय फिर से आए जब मनुष्य और प्रकृति ,स्त्री पुरुष और पेड़ पौधे एक साथ सहअस्तित्व में रह सके।
लेकिन तब तक हमें सड़क पर चलते हुए पुरुषों को खुद से ही बात करते हुए देख कर चौकन्ना रहना होगा। कहीं ना कहीं प्राकृतिक संवाद का तालमेल टूटा है। और बहुत हद तक इस संस्थागत ढांचे में स्त्री और पुरुष के बीच ऊपर और नीचे आगे और पीछे होने के भाव को पैदा किया है।

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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