आग की तासीर

आग की तासीर

आग की तासीर

 

◆आग का अविष्कार मनुष्य ने खुद को गर्म रखने के लिए किया था, लेकिन आग अपने साथ धुँआ भी लेकर आई। ये बात समझने में मनुष्य को पाँच हजार साल लगे, जब फ्रांस की क्रांति के बाद औद्योगिक क्रांति आई।

 

◆ हर कोई आग होना चाहता है, जबकि हर एक की नियति राख होना है।

 

◆ मनुष्य की आँख में एक जगह ऐसी भी होती है जहाँ आग और पानी एक साथ रहते है। वहीं से आगबबूला होते पिता की आँखों से आँसू भी निकलते है।

 

◆इंतजार की भट्टी में वक्त पिघलता है और धीरज आकार लेता है। एक आग ये काम भी करती है।

 

◆सर्दियों में मनुष्य आग जला कर अपने आप पर अघाता है। मगर वो भूल जाता है कि पेड़ो पर बने घोसलें उसकी इस मूर्खता पर मुस्कुराते है।

 

◆आग ऊर्जा का एक रूपांतरण भर है। इसलिए हर किस्म की आग अंततः बुझ जाती है।

 

◆जब हम आग होते है, हमारे पास कोयला नही होता। और जब हम कोयला हो जाते है तब हम आग को भूल चुके होते है। जिंदगी का व्यंग्य इसी के आसपास बुना हुआ है।

 

 

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Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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