सुनों ! तुमसे कुछ कहना है

सुनों ! तुमसे कुछ कहना है

सर्दियाँ है तुम्हारी झाँक में. तुम्हारे बिस्तर पर रखी किताबें चुगलखोर है। तुम्हारे साये झूठ नही बोलते. उन्हें आसमान की बेफिक्री याद आती है। तुम खामोश निगाहों से पहाड़ को देखती हो तो तलहटी में दीपक जल जाते है। ऐसे कैसे तुम बस जाती हो किसी नए शहर में, जहाँ का पता तुमने कभी नोट नही किया। कहीं ऐसा तो नही कि तुमने उँगलियों पर कभी अपनी उम्र के साल नही गिने. और आज भी तुम खुद को अपने अब्बा के दिए नाम से ही पुकारती हो !

ये सारी बाते कहते कहते मैं धीमे से सो गया। और तुम्हारी गली के झींगुर आज फिर मेरी नींद में तमाशा कर गए। ऐसा क्यों है, कि तुम्हारी किताबें मेरी बात करती है उन आवारा झींगुरों से जो रात को निकलते है। और मेरी भूलने की बीमारी को नींद में ठीक करने आ धमकते है।

एक बात याद रखना, जिस तरह तुम अपने मसालों के डिब्बों के बारे में हर छोटी से छोटी बात याद रखती हो। तुम्हारा होना मेरे लिए वैसे ही है जैसे साँसे है, ये जमीन है, ये हवा और आसमान है। पिछले दिनों जब मैं ईश्वर के बारे में सोच रहा था; तब मैंने पाया कि ईश्वर अगर सामने आ ही नही सकता तो कैसा ईश्वर। अगर वो बात कर ही नही सकता उम्रभर तो ऐसा ईश्वर किस लिए ! तभी ख्याल आया कि मेरे बिस्तर से लेकर मेरे रास्तों तक वो खड़ा और भरा पड़ा है। इसी वजह से कह रहा हूँ कि आसमान, छाया, नदी, पहाड़ और साँसों की तरह तुम ईश्वर के मेरे आविष्कार में मौजूद हो।

अब बताओ तुम्हारे मसालों के डिब्बों में मौजूद तुम्हारी यादाश्त तुम्हे मेरे लिए कितना आसान बनाती है। इसीलिए तुम हर जगह हर शख्स में मौजूद हो।

यही कहना चाह रहा था।  

Ratanjeet

रतनजीत गुर्जर इस ब्लॉग के फाउंडर और सम्पादक है। इतिहास और दर्शनशास्त्र विषयों से यूजीसी नेट है। और अभी स्वामी विवेकानंद कॉलेज, गोठड़ा में संयुक्त निदेशक तथा असिस्टेंट प्रोफेसर का काम करते है। यारी-दोस्ती में ढाबे पर बैठना अच्छा लगता है। सो इस ब्लॉग वेबसाइट का विचार भी वही से बन गया। दोस्तों की सद्भावना का ही असर है कि ये ब्लॉग नमूदार हो उठा।

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